वन्देमातरम्: राष्ट्र भूमि की चेतना का स्वर
आचार्य संजय तिवारी
वंदे, अर्थात वंदना और मातरम् शब्द का अर्थ है माँ, अर्थात वह , जिसने जन्म दिया। कौन और किसको? भारतीय चिंतन, दर्शन, लोक और ज्ञान परंपरा के अनुसार उत्तर है, मुझे, हमें, सभी को, सभी मनुष्यों को, पशुओं को, पक्षियों को, वनस्पतियों को, नदियों को, पर्वतों को, जंगलों को, समस्त प्राणियों को, समस्त जगत को। उसी ने जन्मा है। उसी ने निर्मित किया है। वहीं कर रही है। उसी के आंगन में, उसी के आंचल में सभी जी रहे हैं। सभी पुष्पित, पल्लवित और विलयित भी हो रहे हैं। मातरम् को वंदे। मातृ तत्व को प्रणाम। वहीं मातृ सत्ता जिसे भारत ने सदा से भू देवी कहा है और उसकी स्तुति की है। उसी को वंदे मातरम् करने का गान रचा है श्रुतियों ने भी और बंकिम चंद्र चटर्जी ने भी। आदिकाल से, सृष्टि के आरम्भ से ही यह स्तुति हमने सदैव की है। वंदे मातरम् के उद्घोष में ही वह शक्ति है जो भारत को ही नहीं बल्कि समस्त जगती को ब्रह्मांड की असीम ऊर्जा जोड़ कर उसे देदीप्यमान करती है। यह अद्भुत है। यह उस शब्द ब्रह्म का ऐसा गान है जिसके स्वर सीधे कॉसमॉस में तरंगित होकर आत्मिक ऊर्जा से गायक को भर देते हैं।
वंदे मातरम्। यह शब्द संस्कृत मूल का है और इसका उपयोग मातृभूमि के लिए भी किया जाता है। वंदे मातरम् का अर्थ है मैं तुम्हें नमन करता हूँ, माँ, जिसमें वंदे का अर्थ वंदना या प्रशंसा में गान करना है और मातरम् का अर्थ माँ या मातृभूमि या समस्त पृथ्वी या समस्त सृष्टि है। यह राष्ट्रीय गीत भारत की संस्कृति और गौरव का प्रतीक है।
माँ के रूप में, मातरम् का सीधा और शाब्दिक अर्थ ‘माँ’ है। मातृभूमि के रूप में, यह शब्द भारत माता, हमारी मातृभूमि के लिए प्रयुक्त होता है। इस गीत में वंदे मातरम् का अर्थ है कि हम अपनी मातृभूमि की पूजा करते हैं, उसे नमन करते हैं और उसकी वंदना करते हैं। यह शब्द मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और सम्मान को व्यक्त करता है। इस गीत की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी, जो वेदों में वर्णित ऋग्वेद के वंद शब्द से प्रेरित है। ‘वंद’ शब्द का अर्थ ‘प्रशंसा करना’, ‘आदर करना’ या ‘पूजा करना’ है, जो वेदों के अनुसार है। इसलिए, ‘वंदे मातरम्’ शब्द का उपयोग वेदों में भूमि को ‘माँ’ के रूप में दर्शाने की अवधारणा से जुड़ा हुआ है। ऋग्वेद के अतिरिक्त अन्य वेदों में पृथ्वी को भी मातृ के रूप में संबोधित किया गया है। उदाहरण के लिए, अथर्ववेद में कहा गया है, “माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या:”, जिसका अर्थ है “हे पृथ्वी माता, मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ”।
श्रुति सार और मातृ स्तुति
मातृ देवो भव के श्रुति संदेश का सार है वंदे मातरम। इस सार तत्व में ही समस्त भारतीय संस्कृति समाहित है। मातृ के अर्थ अनेक हैं। मातृ मिट्टी भी है। मातृ जननी अर्थात जन्म देने वाली माता भी है। समस्त पृथ्वी, समस्त प्रकृति, समस्त नदियां मातृ स्वरूप हैं। इसीलिए भारतीय संस्कृति में ये सभी पूज्य हैं। मातृ शक्ति की अवधारणा केवल भारत के वांग्मय ही स्थापित करते हैं। इसी अवधारणा के कारण वंदेमातरम गीत को राष्ट्र गीत के रूप में अंगीकार किया गया है। बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास आनंद मठ में इस गीत के कुल पांच अंतरे हैं । इनमें से आरंभ के दो अंतरे ही गायन में प्रचलन में हैं। इस उपन्यास में यह गीत भवानन्द नाम के संन्यासी द्वारा गाया गया है। बाद में इसकी धुन यदुनाथ भट्टाचार्य ने बनायी थी।
यह कविता की दृष्टि से जितनी उत्कृष्ट रचना है उससे भी महत्वपूर्ण इसका भाव है। यह मनुष्य के जीवन संस्कृति का वह समस्त आधार तत्व प्रस्तुत करने में सक्षम है जिसे गोस्वामी तुलसी दास जी ने मर्यादा पुरुषोत्तम की स्थापना में बालकाण्ड में ही परिभाषित कर दिया है। मानव जीवन के सभी सनातन तत्व इस गीत में विद्यमान हैं जिनकी अलग अलग स्तुतियाँ मनुष्य अलग अलग समय पर करता है। वह चाहे धरती हो, आकाश हो, वनस्पतियां हों, प्रकृति हो, दैवीय शक्तियां हों, लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा हों या ऐसे वे सभी प्रतीक जिनसे मनुष्य शक्ति सम्पन्न होकर जीवन यात्रा करना चाहता है या करता है।
वंदेमातरम ठीक वैसा ही सम्पूर्ण है जैसा हमें सत्यमेव जयते अथवा तमसो मा ज्योतिर्गमय के उच्चारण से आभास होता है। इस गीत में मनुष्य और परमसत्ता अर्थात ईश्वर के बीच का ऐसा संवाद रचा गया है जो ठीक वैसा ही समर्पण दर्शाता है जैसे कि माता के आंचल में संरक्षित शिशु।
- वन्दे मातरम की पहली पंक्ति सुजलां सुफलाम् मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलाम् ही हमें प्रकृति से जोड़ने का काम करती है। जीवन के लिए जरुरी संसाधन जैसे शीतल जल, हरे भरे खेत, अच्छे फलों, सुगन्धित हवाओं की वंदना किया जाना न केवल आज के समय की आवश्यकता है बल्कि यह हमेशा से ही जीवनदाता रहा है।
- कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले , अबला केन मा एत बले। बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं रिपुदलवारिणीं मातरम् ,
यह मातृ शक्ति की सर्वोपरिता को द्योतित करती है। पश्चिम के पुरुष सत्तात्मक समाज ने स्त्री को दोयम दर्जे का नागरिक बना कर रख दिया जिसके लिए आज नारी सशक्तिकरण : सरकार की मिशन शक्ति का सहारा लेना पड़ रहा है ।
3.वन्दे मातरम की वैज्ञानिकता , संगीत, भाषा और महत्त्व को देखते हुए बीबीसी द्वारा 2003 में किए गए 155 देशों के सर्वेक्षण में शीर्ष 10 में स्थान दिया गया।
- 65 सेकंड में गया जाता है वन्दे मातरम गीत।
5.भारतीय मनीषियों की कल्पना जो देश के विकास के लिए जरुरी है जैसे- विद्या, धर्म, भक्ति, कर्म, प्राण को इस गीत में समाहित करके यह बताया गया है कि देश के सर्वांगीण विकास के लिए सभी पक्षों का विकास जरुरी है।
6.वन्दे मातरम- ज्ञान, विज्ञान, देश, मानव के सभी विषयों को शब्द रूप में समाहित करता है । ज्ञान होना चाहिए अपने आस-पास की प्रकृति का, जीवन की रक्षा के लिए अस्त्र-शस्त्रों का, मुक्ति के लिए धर्म का और इसके साथ ही साथ अपने शत्रुओं की अच्छाइयों और बुराइयों का। उन्नत विज्ञान होना चाहिए कमल के फूल पर विचरण करने जितना माइक्रो साइंस, गीत संगीत और विद्या का विकास देश के विकास के लिए बहुत जरुरी है।
7.कमलां अमलां अतुलां सुजलां सुफलां मातरम् । आधुनिक सन्दर्भ में जब हम इसे देखते हैं कि हमारा ज्ञान कैसा होना चाहिए कमलां अर्थात धन को उत्पन्न करने वाला हो, आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ाने वाला होना चाहिए, अमलां अर्थात हमारा ज्ञान पवित्र होना चाहिए, दुनिया में जहाँ प्लेगरिज्म चल रहा है वहां हम शुरू से ही ज्ञान की पवित्रता की बात करते रहे हैं। अतुलां हो जिसकी कोई तुलना न हो, सुजलां अर्थात जीवन देने वाली और सुफलां अर्थात अच्छे फल देने वाली हो। हमारे मनीषियों ने ऐसे ज्ञान की कल्पना की है।
वन्दे मातरम्
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा संस्कृत बाँग्ला मिश्रित भाषा में रचित इस गीत का प्रकाशन सन् 1882 में उनके उपन्यास आनन्द मठ में अन्तर्निहित गीत के रूप में हुआ था। इस उपन्यास में यह गीत भवानन्द नाम के संन्यासी द्वारा गाया गया है। इसकी धुन यदुनाथ भट्टाचार्य ने बनायी थी। इस गीत को गाने में 65 सेकेंड (1 मिनट और 5 सेकेंड) का समय लगता है।
सन् 2003 में, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अन्तरराष्ट्रीय सर्वेक्षण में, जिसमें उस समय तक के सबसे मशहूर दस गीतों का चयन करने के लिये दुनिया भर से लगभग 70 हजार गीतों को चुना गया था और बी०बी०सी० के अनुसार 155 देशों/द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था उसमें वन्दे मातरम् शीर्ष के 10 गीतों में दूसरे स्थान पर था।
वन्देमातरम और बंदे मातरम्
यदि बाँग्ला भाषा को ध्यान में रखा जाय तो इसका शीर्षक “बन्दे मातरम्” होना चाहिये “वन्दे मातरम्” नहीं। चूँकि हिन्दी व संस्कृत भाषा में ‘वन्दे’ शब्द ही सही है, लेकिन यह गीत मूलरूप में बाँग्ला लिपि में लिखा गया था और चूँकि बाँग्ला लिपि में व अक्षर है ही नहीं अत: बन्दे मातरम् शीर्षक से ही बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने इसे लिखा था। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए शीर्षक ‘बन्दे मातरम्’ होना चाहिये था। परन्तु संस्कृत में ‘बन्दे मातरम्’ का कोई शब्दार्थ नहीं है तथा “वन्दे मातरम्” उच्चारण करने से “माता की वन्दना करता हूँ” ऐसा अर्थ निकलता है, अतः देवनागरी लिपि में इसे वन्दे मातरम् ही लिखना व पढ़ना समीचीन होगा।
संस्कृत मूल गीत
वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलाम्
मलयजशीतलाम्
शस्यश्यामलाम्
मातरम्।
शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम्॥ 1 ॥
कोटि कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,
अबला केन मा एत बले।
बहुबलधारिणीं
नमामि तारिणीं
रिपुदलवारिणीं
मातरम्॥2॥
तुमि विद्या, तुमि धर्म
तुमि हृदि, तुमि मर्म
त्वम् हि प्राणा: शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारई प्रतिमा गडी मन्दिरे-मन्दिरे॥3॥
त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदलविहारिणी
वाणी विद्यादायिनी,
नमामि त्वाम्
नमामि कमलाम्
अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलाम्
मातरम्॥4॥
वन्दे मातरम्
श्यामलाम् सरलाम्
सुस्मिताम् भूषिताम्
धरणीं भरणीं
मातरम्॥5॥
राष्ट्रीय गीत बनने की यात्रा:
वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रीय गीत है जिसकी रचना बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा की गई थी। इन्होंने 7 नवम्बर, 1876 ई. में बंगाल के कांतल पाडा नामक गाँव में इस गीत की रचना की थी। वंदे मातरम् गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बांग्ला भाषा में थे। राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने इस गीत को स्वरबद्ध किया और पहली बार 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में यह गीत गाया गया। अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेज़ी में और आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इसका उर्दू में अनुवाद किया। ‘वंदे मातरम्’ का स्थान राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ के बराबर है। यह गीत स्वतंत्रता की लड़ाई में लोगों के लिए प्ररेणा का स्रोत था।