बिहार में यूरिया एवं डीएपी की स्थिति: चुनौती, कारण और समाधान

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डॉ. अरविंद नाथ तिवारी

बिहार देश के प्रमुख कृषि प्रधान राज्यों में से एक है, जहां राज्य की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से खेती पर निर्भर है। धान, मक्का, गन्ना, गेहूं, दलहन, तिलहन तथा सब्जियों की खेती यहां की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। इन फसलों की अच्छी पैदावार के लिए समय पर और संतुलित मात्रा में उर्वरकों की उपलब्धता अत्यंत आवश्यक होती है। विशेष रूप से यूरिया और डीएपी (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) किसानों की सबसे अधिक उपयोग में आने वाली खाद हैं। हर वर्ष खरीफ और रबी सीजन के दौरान इनकी मांग कई गुना बढ़ जाती है। यदि समय पर उर्वरक उपलब्ध नहीं होते तो बुवाई, पौधों की वृद्धि और अंततः उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

वर्तमान खरीफ मौसम में बिहार के कई जिलों से यूरिया और डीएपी की कमी की शिकायतें सामने आई हैं। अनेक स्थानों पर किसानों को उर्वरक प्राप्त करने के लिए घंटों कतारों में खड़ा रहना पड़ रहा है। कुछ क्षेत्रों में निर्धारित मूल्य से अधिक कीमत वसूलने, कृत्रिम कमी पैदा करने और कालाबाजारी की शिकायतें भी सामने आई हैं। इससे किसानों की आर्थिक परेशानी बढ़ी है और खेती की लागत में भी वृद्धि हुई है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह स्थिति और अधिक कठिन हो जाती है क्योंकि उनके पास अतिरिक्त संसाधन नहीं होते।

विशेषज्ञों के अनुसार बिहार में उर्वरकों की कमी का सबसे बड़ा कारण यह है कि राज्य में यूरिया और डीएपी का पर्याप्त उत्पादन नहीं होता। बिहार अपनी अधिकांश आवश्यकता अन्य राज्यों के उर्वरक संयंत्रों से प्राप्त करता है। इन उर्वरकों की आपूर्ति रेलवे रैक, सड़क परिवहन और गोदामों के माध्यम से होती है। यदि रेलवे रैक समय पर उपलब्ध नहीं होते या परिवहन व्यवस्था बाधित होती है तो जिलों तक उर्वरकों की आपूर्ति प्रभावित हो जाती है। कई बार गोदामों से खुदरा विक्रेताओं तक वितरण में भी विलंब होता है, जिससे कृत्रिम संकट की स्थिति बन जाती है।

उर्वरक संकट का एक अन्य कारण असंतुलित उपयोग भी है। अनेक किसान वैज्ञानिक सलाह के बजाय केवल यूरिया पर अधिक निर्भर रहते हैं। इससे यूरिया की मांग अचानक बढ़ जाती है, जबकि फसल को संतुलित पोषण नहीं मिल पाता। कृषि वैज्ञानिक लगातार सलाह देते रहे हैं कि नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का संतुलित उपयोग ही अधिक उत्पादन और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने का सबसे प्रभावी उपाय है। केवल यूरिया के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है और दीर्घकाल में उत्पादन क्षमता भी घट सकती है।

केंद्र और राज्य सरकार समय-समय पर उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कई कदम उठाती रही हैं। उर्वरक की आपूर्ति की नियमित निगरानी, जिला स्तर पर भंडारण की समीक्षा, कालाबाजारी रोकने के लिए छापेमारी तथा लाइसेंसधारी विक्रेताओं का निरीक्षण जैसे प्रयास लगातार किए जा रहे हैं। कई जिलों में कृषि एवं प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा खाद-बीज दुकानों की जांच भी की जा रही है, ताकि किसानों को निर्धारित मूल्य पर उर्वरक उपलब्ध कराया जा सके।

इसी क्रम में हाल ही में वाल्मीकिनगर के सांसद सुनील कुमार ने नई दिल्ली में उर्वरक एवं रसायन मंत्रालय की संयुक्त सचिव वंदना प्रेयसी तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के निदेशक (मूवमेंट) अभय कुमार से मुलाकात कर बिहार, विशेष रूप से वाल्मीकिनगर लोकसभा क्षेत्र में यूरिया और डीएपी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने की मांग की। उन्होंने अधिकारियों को अवगत कराया कि खरीफ सीजन में उर्वरकों की कमी के कारण किसानों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। समय पर खाद उपलब्ध नहीं होने से खेती का पूरा चक्र प्रभावित हो सकता है इसलिए आवश्यक है कि बिहार को उसकी मांग के अनुरूप पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराया जाए।

बैठक के दौरान केंद्रीय अधिकारियों ने सांसद को आश्वस्त किया कि बिहार की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए यूरिया एवं डीएपी की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। अधिकारियों ने कहा कि रेलवे रैक की उपलब्धता बढ़ाने, वितरण व्यवस्था को सुचारु बनाने तथा समयबद्ध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय किया जा रहा है।

दीर्घकालिक समाधान के लिए केवल आपूर्ति बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा। बिहार में उर्वरक वितरण व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी तथा तकनीक आधारित बनाना होगा। प्रत्येक जिला में मांग के अनुरूप अग्रिम भंडारण, ऑनलाइन निगरानी प्रणाली, नियमित निरीक्षण तथा दोषी विक्रेताओं पर कठोर कार्रवाई आवश्यक है। साथ ही किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर संतुलित उर्वरक उपयोग के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। जैविक खाद, हरी खाद और वैकल्पिक पोषक तत्वों के उपयोग को भी बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता कम हो सके।

बिहार की कृषि व्यवस्था की मजबूती के लिए यूरिया और डीएपी की नियमित, पर्याप्त और समय पर उपलब्धता अत्यंत आवश्यक है। यदि केंद्र और राज्य सरकार बेहतर समन्वय के साथ आपूर्ति व्यवस्था को सुदृढ़ करें, परिवहन और वितरण प्रणाली को प्रभावी बनाएं, कालाबाजारी पर सख्त कार्रवाई करें तथा किसानों को वैज्ञानिक एवं संतुलित उर्वरक उपयोग के प्रति जागरूक करें, तो उर्वरक संकट पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। इससे न केवल कृषि उत्पादन में वृद्धि होगी, बल्कि किसानों की आय बढ़ेगी, मिट्टी की उर्वरता सुरक्षित रहेगी और बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था भी अधिक सशक्त एवं आत्मनिर्भर बन सकेगी।

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