भौतिक संसाधन प्रकृति के सौंदर्य को कर रहे नष्ट

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अरुण कुमार दीक्षित

प्रकृति का संस्कृति से सीधा संबंध है। प्रकृति हमेशा से है। प्रकृति हर कर्ता से पहले मौजूद है। प्रकृति में परिवर्तन अर्थात पर्यावरण असंतुलित होना है। संपूर्ण विश्व के सामने पर्यावरण संतुलन की चुनौती है। विश्व में भौतिक संसाधन बढ़ें हैं। यही भौतिक संसाधन प्रकृति के अप्रतिम सौंदर्य को क्षत विक्षत कर रहे हैं। प्रकृति के सौंदर्य से मनुष्य का सौंदर्य जुड़ा है। जीवन सम्भव है। यही कारण है कि भिन्न-भिन्न जलवायु वाले देशों क्षेत्रों के मनुष्य अलग तरह के दिखाई देते हैं। मनुष्यों का रंग कहीं श्वेत है तो कहीं वे श्याम रंग के हैं। तो कहीं तांबे जैसा मनुष्यों का रंग है। किसी की आंखें सुंदर दिखती हैं। किसी देश के मनुष्य की आंखें कम खुलती हैं। किसी की आंखें मृगनयनी कही जाती हैं। किसी की नाक का सौंदर्य है। मनुष्य के शरीर प्रकृति के अनुसार विकसित होते जाते हैं।

डार्विन कहता है कि मनुष्य और बंदराे के पूर्वज एक थे। वे विकसित होकर ही मनुष्य बने । दूसरा वैज्ञानिक सिद्धान्त है कि जल में अमीबा और से मनुष्य के पूर्वज एक थे। सनातन में अवतार का विज्ञान है। पहला मत्स्य है। दूसरा कच्छप अवतार हैं। तीसरा वराह अवतार है। चौथा नरसिंह अवतार है। यह थोड़ा मनुष्य थोड़ा सिंह जैसा है। फिर वामन अवतार आया। फिर भगवान परशुराम आये। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम आये। अंत में श्रीकृष्ण को पूर्णावतार कहा गया।

गर्मी-सर्दी का सीधा प्रभाव मनुष्य के शरीर पर पड़ता है। हमारा आचरण प्रकृति अनुरूप होना चाहिए। पर ऐसा हो नहीं रहा। विज्ञान संपूर्ण प्राकृतिक नैसर्गिक नियमन को चुनौती दे रहा है। नदियां प्रदूषित हो रही हैं। नदियों का जल पीने योग्य नहीं बचा है। वैदिक सभ्यता सिंधु के तट पर विकसित हुई। वैदिक सभ्यताओं में नदियों को जल माताएं कहा गया है। भूतत्व विज्ञानी सिंधु सभ्यता को वैदिक काल के बाद का मानते हैं। सिन्धु सभ्यता में प्रकृति के अनुसार आचरण दिखाई पड़ता है। वैदिक समाज में सूर्य से चंद्रमा से अग्नि से वनस्पतियों से इंद्र से प्रार्थनाएं हैं। सूर्य प्रतिदिन उगता है मगर वह पुराना होकर नया है। वह आदि अनादि है। हम सूर्य को नमस्कार करते हैं। सूर्य चंद्रमा, पृथ्वी, जल, अग्नि, वनस्पतियों के बीच ही जीवन आनंद मय है।

ऋग्वेद में प्रकृति माता और ऋत ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का आधार ( अरण्यनी सूक्त में प्रकृति को वन देवी के रूप पूजा गया है)। अथर्ववेद में पृथ्वी को माता भूमि : पुत्रों अहं पृथिव्या :(भूमि सूक्त) में कहा गया है। यजुर्वेद में प्रकृति और पर्यावरण के मूल तत्व (जल, वायु अग्नि, आकाश और पृथ्वी को पंच महाभूत कहा) पर श्रीकृष्ण कहते है कि अपरा प्रकृति (जल या भौतिक) यह नाशवान है। जड़ है। आठ भागों में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि परा प्रकृति चेतन या जीव प्रकृति यह श्रेष्ठ और चेतन प्रकृति है। जो सभी प्राणियों में स्थित जीवात्मा है। प्रकृति के तीन गुण बताए गए है। सत्व गुण – पवित्रता और ज्ञान। रजो गुण – कर्म इच्छा और आसक्ति, तमो गुण – अज्ञान,आलस्य ,अनिद्रा।

वैज्ञानिकों के निष्कर्ष है कि तापमान बढ़ रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। उनका जल महासागरों में आ रहा है। अधिक ग्लेशियरों के पिघलने से महासागरों की बाढ़ के चपेट में दुनिया के देश आएंगे। उसमें भारत के भी कुछ तटीय महानगर सम्मिलित हैं। भारी प्राकृतिक विपदा होगी। तब क्या है वैज्ञानिकों की चेतावनी पर ध्यान दे रहे हैं? उत्तर आएगा नहीं। प्रकृति अपना संतुलन स्वयं बनाती है। हम सब इस ब्रह्मांड का अंश ही हैं। दिखाई भिन्न प्रकार के पड़ते हैं। तब हमारा आचरण ऋत नियमन से भरा होना चाहिए। प्रकृति ने लाखों करोड़ों वनस्पतियों को हमें दिया। उसका हमें परमात्मा को धन्यवाद देना चाहिए। मगर किसी व्यक्ति को धन्यवाद देने में भी कंजूसी करते हैं। हम प्रकृति के साथ सभी जीवों को प्रेम करना चाहिए। हम नहीं करते। प्रेम के काव्य लिखते हैं। प्रेम नही करते। हमारी श्वास प्रतिश्वांस परमात्मा की है हम उसे धन्यवाद नही करते।

हमने नदियों को कचरे से पाटने का बड़ा पुरुषार्थ किया है। इससे मछलियां विलुप्त हो रही हैं। अन्य जलीय जीव खतरे में है । अनेक विलुप्त हो गए हैं। प्लास्टिक कण इन जीवों के भीतर तक पहुंच गए हैं। आर्सेनिक, निकिल, क्रोमियम सीसा, पारा, फ्लोराइड , फिनायल प्लास्टिक जैसे प्राण घातक रसायन नदियों में डाल रहे हैं। पांच सितारा होटलों के लिए नदियों के पवित्र तटों को नष्ट कर रहे हैं। नदियों के किनारे रहने वाले जीवों का अधिकार छीन रहे हैं। अस्पतालों के नाले नदियों में डाले जा रहे हैं।

इससे अनुमान लगा सकते हैं कि हमारा भारतीय समाज और दुनिया की सभ्यता कितनी सुशिक्षित है ? सुसंस्कृत है ? वहीं अनेक लोग जिनकी कोई डिग्री नहीं। स्कूल नहीं गए। वह सभी नदियों को माता मानकर आज भी ग्रह नक्षत्रों के नियम के अनुसार प्रणाम करते हैं। स्नान करते हैं। नीराजन करते हैं। उन्हें असभ्य और गंवार कहा जाता है, जबकि इन्हीं का आचरण प्रकृति जैसा है। आदिकाल से आचरण किया है। पर्यावरण में संतुलन इनका बड़ा योगदान है। आधुनिक भारत में नदियों को पहाड़ों को वनों को अधिकतम नुकसान पहुंचा है। नदियों का हृदय स्थल बेध डाला। दिशाएं बदल दीं। पहाड़ों को बारूद से उड़ाया। वनों को समाप्त करने के लिए आधुनिक मशीन ले आये। काटना शुरू किया।

खेती को आधुनिक विषैली बनाया। रासायनिक बनाया। रसायनों से कैंसर दिया। और यह सब पढ़े-लिखों ने ही किया है। इसमें सरल अनपढ़ लोगों का कोई दोष नहीं है। वैदिक और सिंधु सभ्यता प्रकृति प्रेमी थी। पशु प्रेमी थी। वनस्पति प्रेमी थी। वह प्रकृति के साथ चले। हम सब आधुनिक यह मशीन लेकर चले। पूर्वजों ने पीपल, बरगद, तुलसी, केला, शमी, नीम, दूब ( दूर्वा) सभी का नीराजन किया। चंपा, चमेली, मनोकामिनी, गुड़हल सरसों, धतूर, जामुन, कैथा, गन्ना, पान, कमल, नील कमल, ब्रह्म कमल से इन जल माताओं की नदियों की देवताओं की आराधना की। वन देवी की आराधना की। प्रकृति की आराधना की। फूलों से प्रकृति से प्रकृति का स्वागत। किया। अहोभाव भाव प्रकट किया। प्रकृति से लिया तो वहीं उसे दे दिया। नदी में उतरे । डुबकी लगाई । आचमन किया। जल को जल से पृथक नहीं किया।

आधुनिक तथाकथित प्रगतिशीलों ने प्लास्टिक के फूल बनाये। आदमी प्लास्टिक के बनाये। लोहे के स्टील के और नाम रखा रोबोट। प्रगतिशील गदगद हैं। आधुनिक हैं। वह प्रगतिशील कहलाने में प्रसन्न होते हैं। पृथ्वी को छोड़कर ग्रहों में जीवन की संम्भावना खोजते हैं। अरबों खर्च कर हो रहे है। हम कहते है कि तुम यहां एक पेड़ सुरक्षित नहीं रख सकते। नदी साफ नहीं रख सकते। सागर-महासागर साफ नहीं रख सकते। वहां क्या करोगे। हिमालय क्षेत्र से वनस्पतियां लुप्त हो रही है। जीवन घट रहा है।

संपूर्ण प्रकृति की संजीवनी भी गल रही है। नष्ट हो रही है और इसका नाम वैश्विक रूप से विकास है। अन्ततः विनाश है। आगे ग्लोबलाइजेशन है। विज्ञान ने यह भी किया है कि संपूर्ण संसार को सात बार नष्ट करने वाले परमाणु बम बनाकर तैयार कर दिया। दुनिया तनावग्रस्त है। युद्ध में है। अब शांति खोज रहे हैं। पूरी दुनिया में शांति का रास्ता खोजने के ढोंग में है। प्रस्ताव है। मीटिंग है। सम्मेलन है। मीडिया की रिपोर्ट है। पहला पर्यावरण सम्मेलन 5 जून से 16 जून 1972 को हुआ था।

पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र का मूल वक्तव्य इस तरह है कि मानव जाति को गरिमा पूर्ण जीवन जीने के लिए एक स्वस्थ पर्यावरण का मौलिक अधिकार है। वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों के लिए इसकी रक्षा करना हमारा सामूहिक कर्तव्य है। संयुक्त राष्ट्र का यह रुख मुख्य रूप से तीन बिंदुओं पर है। पहला जलवायु परिवर्तन दूसरा जैव विविधता का नुकसान और तीसरा प्रदूषण से निपटने का कार्य करता है। प्रश्न है कि संयुक्तराष्ट्र की सुनता कौन है।पर्यावरण पर सम्मेलन बिना निष्कर्ष सम्पन्न हो जाते हैं। इसलिए रुको। प्रकृति को देखो। वह तुम हो। निहारो होशपूर्वक वह तुम्हारी संततियों की पालनहार है। वह ही माता और पिता है। वह परमशक्ति है। भिन्न-भिन्न रूपों में व्यक्त है। अव्यक्त भी है। वही तेजस है। ज्योतिर एकं है। उसका ही नाम परमात्मा है। सभी दिशाओं में है। उस परम आवरण को बारम्बार नमस्कार है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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