अनियंत्रित पर्यटन से त्रस्त नैनीताल

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प्रयाग पाण्डे

विश्व विख्यात हिल स्टेशन नैनीताल में मनुष्य से अधिक दोपहिया और चौपहिया वाहनों का रेला उमड़ने लगा है। वाहनों की अनियंत्रित और बेतहाशा भीड़ के चलते नगर की सांसें थम सी गईं हैं। अपनी क्षमता से कई गुना अधिक बोझ ढो रही नगर की सभी सड़कें और गलियां दोपहिया और चौपहिया वाहनों से पट सी गईं हैं। सामान्य आवागमन भी बाधित हो गया है। पैदल चलने को रास्ते नहीं बचे हैं। नगर का हरेक कोना और पैदल रास्ते गाड़ियों से पट गए हैं। नगर में यत्र, तत्र, सर्वत्र जाम लगना आम बात हो गई है। हालात इस कदर खराब हो चुके हैं कि आम आदमी के लिए पैदल चलने की जगह ही नहीं बची है।पहले पर्यटन सीजन के दिनों कभी-कभार ऐसी स्थिति आती थी। अब यह समस्या बारहमासी हो गई है।

सुंदर प्राकृतिक झील, अनुपम सौंदर्य और स्वास्थ्यवर्धक जलवायु के मद्देनजर 183 वर्ष पूर्व अंग्रेजों ने नैनीताल नगर की बसावट शुरू की थी। औपनिवेशिक शासक नैनीताल की तुलना यूरोपीय देशों से करते थे। नैनीताल का स्वच्छ और शुद्ध वातावरण एवं आबोहवा को अच्छे स्वास्थ्य के लिए आदर्श माना जाता था। अंग्रेजी शासनकाल में नैनीताल को ‘कंट्री रिट्रीट’ कहा जाता था। अंग्रेज यहां के पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण का विशेष खयाल रखते थे। तब नैनीताल की सुंदरता, शांति और सुरक्षा, विश्व विख्यात थी। आज यह सब खतरे में हैं। वर्तमान में नैनीताल ध्वनि एवं वायु प्रदूषण के चपेट में है।

नैनीताल जब बसा तब आने-जाने के लिए रास्तों की समुचित व्यवस्था नहीं थी। तब कालाढूंगी से पैदल नैनीताल आया जाता था। कालांतर में पुरुषों के लिए घोड़ों की सवारी और महिला यात्रियों के लिए डांडी की व्यवस्था बनाई गई।यात्रियों का सामान ढोने के लिए कुलियों का प्रबंध था। करीब चार दशक तक यह व्यवस्था बनी रही। इसी दरम्यान नैनीताल एक सुव्यवस्थित नगर के रूप में बसा और सजा- संवरा। उस दौर में मैदानी इलाकों की गर्मियों के थपेड़ों से बचने और विशुद्ध हवा की ठंडी बयार में स्वच्छंद भ्रमण के लिए सैलानी नैनीताल आते थे।

1862 में नैनीताल नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज आगरा एंड अवध की ग्रीष्मकालीन राजधानी बना। 24 अक्टूबर, 1884 को काठगोदाम रेल यातायात से जुड़ा। इसके बाद यात्रीगण काठगोदाम से ज्योलीकोट- ब्रेबरी होते हुए पैदल नैनीताल पहुंचने लगे। 1893 में नैनीताल तक तांगे पहुंच गए। अविभाजित भारत के सबसे बड़े ओहदेदार वॉयसरॉय, नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज के लेफ्टिनेंट गवर्नर, सेना और प्रशासन के आला अफसरान तांगों में बैठकर नैनीताल पहुंचने लगे।

1915 के आसपास मोटर मार्ग बनने के बाद काठगोदाम से नैनीताल तक मोटर लॉरी चलने लगी। लॉरी तल्लीताल तक ही आ सकती थी। नैनीताल के लचीले एवं भंगुर पर्यावरण और स्थानीय विशिष्टाओं के मद्देनजर नगर के भीतर यांत्रिक यातायात नहीं था। डांडी, झम्पानी, घोड़े और हाथ रिक्शा ही यातायात के एकमात्र मुख्य साधन थे।

नगर के बाहरी हिस्से में साइकिल चलाने के लिए नगर पालिका से लाइसेंस लेना अनिवार्य था। कार्ट रोड (नैनीताल-हल्द्वानी मार्ग) और डिपो रोड ( नैनीताल-भवाली मार्ग) में ही साइकिल चलाने की इजाजत दी जाती थी। 1901 में जब नैनीताल की ग्रीष्मकालीन आबादी 7609 थी, सिर्फ 520 बंगले और दूसरे मकानात थे, तभी नैनीताल के भार वहन क्षमता की बात होने लगी थी। अंग्रेज नैनीताल के नाजुक पर्यावरण के मद्देनजर यहां निश्चित सीमा से अधिक आबादी को बसाने के सख्त खिलाफ थे। कुमाऊं के तत्कालीन कमिश्नर कैप्टन ए. डब्ल्यू. इबट्सन ने 19 जुलाई, 1929 को नगर पालिका नैनीताल की वार्षिक रिपोर्ट में लिखी एक टिप्पणी में कहा था- ” इस समय नैनीताल की एक स्वास्थ्यप्रद नगर की छवि है पर भविष्य में इस छवि को बनाए रखने में कुछ जटिल समस्याएं नजर आ रही हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह नगर अति इंसानों से भर गया है।” जब कैप्टन इबट्सन ने यह टिप्पणी की, उस दौर में नैनीताल की आबादी करीब 12 हजार थी।

1937 में नगर पालिका ने नैनीताल की मालरोड में नियंत्रित यांत्रिक यातायात की अनुमति प्रदान कर दी। तब नगर पालिका के अध्यक्ष या सचिव की पूर्वानुमति से विशेष परिस्थितियों में तल्लीताल से सचिवालय (वर्तमान उत्तराखंड उच्च न्यायालय) तक ही वाहन आ-जा सकते थे। 1938 में नगर पालिका ने मालरोड में वाहनों की अधिकतम गति सीमा दस मील प्रति घंटा तय कर दी थी। मालरोड में यांत्रिक यातायात की अनुमति दिए हुए दो साल भी नहीं बीते थे भू-वैज्ञानिकों ने मालरोड के अतिरिक्त अन्य स्थानों में वाहनों की आवाजाही का विरोध करना प्रारंभ कर दिया था। भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के तत्कालीन अधीक्षक ए. एल. कॉल्सन ने 5 अगस्त, 1939 की अपनी एक रिपोर्ट में नैनीताल नगर के भीतर वाहनों की आवाजाही पर पाबंदी लगाने की सिफारिश की। 22 जनवरी,1942 को नगर पालिका ने मालरोड में दस पैडल रिक्शे चलाने की अनुमति दी। तब मालरोड में यातायात के नाम पर यही सिर्फ दस पैडल रिक्शे चला करते थे।

साल 1947 में भारत आजाद हो गया। अंग्रेज अपने वतन लौट गए। वह संरक्षणवादी नीतियों को भी अपने साथ ले गए। आजादी के करीब दो दशकों तक मामूली शिथिलताओं के साथ ब्रिटिशकालीन व्यवस्थाओं का अक्स बना रहा। नगर पालिका के तत्कालीन सदस्य चन्द्रलाल साह द्वारा 5 दिसंबर,1966 को बोर्ड की बैठक में प्रस्तुत प्रस्ताव संख्या-दो के जरिए मालरोड में कार और भारी वाहनों के चलने पर पाबंदी लगाने की मांग की गई। यह प्रस्ताव स्थगित हो गया । 1980 के दशक तक भी नगर में यांत्रिक यातायात नियंत्रित संख्या में था। मारुति संस्कृति आने के बाद नैनीताल का पूरा परिदृश्य बदल गया।

नैनीताल नगर में मोटर मार्ग बाजार क्षेत्र, अश्व मार्ग और पैदल मार्ग सहित सड़कों की कुल लंबाई करीब एक सौ किलोमीटर के आसपास है। इसमें वाहन चालित सड़कों के रूप में मान्य सड़कों की लंबाई करीब 18 किलोमीटर है। बाकी पैदल मार्ग हैं। यहां मकानों की संख्या करीब दस हजार के आसपास पहुंच गई है। तकरीबन हरेक परिवार के पास एक से अधिक दोपहिया और चौपहिया वाहन हैं। टैक्सी बाइक और टैक्सी स्कूटी की कोई गिनती ही नहीं है।

पर्यटक सीजन के दिनों प्रशासन द्वारा निश्चित संख्या में ही पर्यटक वाहनों को नगर में प्रवेश की आज्ञा दी जाती है। बावजूद इसके पीक सीजन में प्रतिदिन करीब ढाई- तीन हजार पर्यटकों के निजी वाहन नैनीताल आते हैं। नतीजतन अब नगर की कोई सड़क और पैदल मार्ग दोपहिया और चौपहिया वाहनों से निरापद नहीं है। टैक्सी बाइक, ‘पापाज’ एवं ‘मम्मीज गिफ्ट्स’ की भीड़ ने आम लोगों के चलने के लिए सड़कों के किनारों की नालियां भी नहीं छोड़ी हैं। इनकी निरंकुश रफ़्तार के चलते पैदल चलने का अर्थ जीवन को खतरे में डालना हो गया है।

अनियंत्रित, अनियोजित एवं अदूरदर्शी विकास ने स्वप्नलोक को एक अव्यवस्थित और अति भीड़भाड़ वाले नगर में बदल दिया है। इंतजामिया नैनीताल नगर की भार वहन क्षमता का आकलन कर तद्नुसार गाड़ियों की संख्या नियंत्रित करने के बजाय पार्किंग बनाने पर जोर दे रहे हैं। पार्किंग के लिए नैनीताल में नियम विरुद्ध ब्रिटिशकालीन नालों में लिंटर डाल दिए गए हैं, जिससे नालों का वजूद और औचित्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया है। इस समस्या से निपटने के लिए नैनीताल की भारवहन क्षमता का आकलन कर दूरदर्शी एवं व्यावहारिक पर्यटन नीति बनाने की आवश्यकता है। फिलवक्त नैनीताल अपनी बेनूरी और दुर्दशा पर सिसक रहा है।

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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