अब दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा या नई शासन प्रणाली जरूरी

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मनोज कुमार मिश्र

 

दिल्ली की जनगणना के आरंभिक जानकारी के मुताबिक दिल्ली की आबादी दो करोड़ तीस लाख से ज्यादा हो गई है। माना जा रहा है कि यह आंकड़ा ढाई करोड़ तक पहुंच सकता है। इसके अलावा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की आबादी इतनी ही और होगी, जिसे दिल्ली की ही विस्तारित आबादी माना जाता है। तमाम प्रयास के बावजूद एनसीआर प्लानिंग बोर्ड दिल्ली पर से आबादी का बोझ घटा नहीं पाया। इसके ठीक उलट एनसीआर की आबादी भी रोजगार, व्यवसाय से ले लेकर उपचार आदि हर काम के लिए दिल्ली पर ही निर्भर है। अभी संयोग से दिल्ली नगर निगम, दिल्ली सरकार से लेकर केन्द्र में भी भाजपा की अगुवाई वाली सरकार है। बावजूद इसके दिल्ली में किसी सरकार के पास पूरे अधिकार नहीं हैं। देश की राजधानी होने के बावजूद दिल्ली आज भी बहुशासन प्रणाली की दंश झेल रही है।

 

जिस भाजपा के अभियान ने दिल्ली को वापस विधानसभा दिलवाई और नई व्यवस्था के तहत 1993 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में जीत कर सरकार बनाई, उसी भाजपा के 2025 के विधानसभा चुनाव के संकल्प पत्र में पहली बार दिल्ली को पूरा (पूर्ण) राज्य बनाने के सवाल पर चुप्पी दिखी। 1483 वर्ग किलोमीटर की दिल्ली में आबादी समाने की एक सीमा है। वह भी तब जब दिल्ली की चुनी हुई सरकार के पास काम करने के पूरे अधिकार न हों। जो अधिकार दिल्ली के उप राज्यपाल के पास हैं कायदे में वही अधिकार दिल्ली सरकार के पास होने चाहिए। इसके अलावा पूरे एनसीआर के लिए नई शासन व्यवस्था पर भी प्राथमिकता से बात होनी चाहिए।

 

दिल्ली की बहुशासन प्रणाली की परेशानियों को समझने का इससे बढ़िया उदाहरण नहीं हो सकता है। सालों से दिल्ली में रह रहे एक अध्यापक ने सवाल किया कि दिल्ली के एक जनप्रतिनिधि के बारे में बताएं, जो मेरी कालोनी की हर समस्याओं का समाधान करा पाए। वैसे यह सांसद, विधायक या निगम पार्षद में से किसी के लिए यह संभव है, अगर वैधानिक तरीके से कहा जाए तो यह किसी के लिए संभव नहीं है। केन्द्र सरकार के नियंत्रण वाला दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) वैधानिक कालोनी बनाकर उसे एक निश्चित समय के बाद दिल्ली नगर निगम को सौंप देता है। निगम कालोनी की सड़कें ठीक करने, साफ-सफाई आदि का काम तो करा सकती है लेकिन बिजली (दिल्ली विद्युत बोर्ड) और पानी (दिल्ली जल बोर्ड) दिल्ली सरकार के अधीन है। यह काम दिल्ली सरकार करेगी। मुख्य सड़कें लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) यानी दिल्ली सरकार के अधीन ही है।

 

कानून-व्यवस्था यानी दिल्ली पुलिस, केन्द्र सरकार के अधीन है। देश की राजधानी दिल्ली का वीआईपी इलाका यानी नई दिल्ली नगर पालिका परिषद(एनडीएमसी) और दिल्ली छावनी इलाका सीधे केन्द्र सरकार के अधीन है। इनके अलावा भी अनेक संस्थाएं स्वशासी हैं और उन पर दिल्ली की किसी सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं है। बावजूद इसके अलग-अलग समय में इन संस्थाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों की भागीदारी कराने के लिए जन प्रतिनिधियों को शामिल किए जाने का प्रावधान किया गया है। इन पर नियंत्रण केन्द्र सरकार से नियुक्त नौकरशाहों का ही है।

 

तकनीकी तौर पर दिल्ली केन्द्र शासित प्रदेश होने के चलते केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि के नाते उप राज्यपाल का पद बनाया गया है। बहुशासन प्रणाली में अकसर अधिकारों के लिए टकराव होते रहने पर कुछ साल पहले दोबारा दिल्ली के उप राज्यपाल बने तेजेन्द्र खन्ना ने सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिल्ली के मुख्य सचिव, डीडीए उपाध्यक्ष, एनडीएमसी अध्यक्ष, नगर निगम आयुक्त, पुलिस आयुक्त की मौजूदगी को बताते हुए कहा कि दिल्ली में कहां है बहुशासन प्रणाली, सभी तो उनके सामने मौजूद हैं। वास्तविकता यही है कि दिल्ली में आजादी के बाद शासन व्यवस्था पर अब तक प्रयोग ही चल रहा है।

 

आजादी के बाद पूरी तरह से केन्द्र सरकार के अधीन आयुक्त प्रणाली लागू किया गया। 1952 में कम अधिकारों वाली विधानसभा बनी। उसे 1955 में राज्य पुनर्गठन आयोग ने अनुपयोगी मानकर भंग करने की सिफारिश की। दिल्ली का विकास होने के साथ दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था बदलती गई। 1957 में दिल्ली नगर निगम बना और निगम के पास ही दिल्ली से जुड़े सर्वाधिक विभाग थे।1966 में महानगर परिषद बनी, उससे निगम के अधिकार कुछ कम हुए।

 

1989 में महानगर परिषद को भंग करके सरकारिया आयोग और बालाकृष्ण कमेटी की सिफारिशों के अनुरूप 1991 में 69 वें संविधान संशोधन के माध्यम से दिल्ली को सीमित अधिकारों वाली विधानसभा मिली। 1993 में विधानसभा का चुनाव हुए। संविधान तैयार करने वाले नेताओं ने यह तय कर दिया था कि दिल्ली केन्द्र शासित प्रदेश ही रहेगी। विधानसभा बन जाने के बावजूद दिल्ली केन्द्र शासित प्रदेश है। इसके चलते राष्ट्रपति इसके शासक हैं और वे अपने प्रतिनिधि(उप राज्यपाल) के माध्यम से दिल्ली का शासन चलाते केन्द्र सरकार उप राज्यपाल 2021 में संसद में संशोधन करके उप राज्यपाल के अधिकार बढ़ा दिए।

 

वर्ष 1911 में दिल्ली देश की राजधानी बनी। 1915 में यमुनापार के 65 गांव दिल्ली की सीमा में शामिल किए गए। तब से दिल्ली 1483 वर्ग किलोमीटर की बनी हुई है, जबकि आबादी काफी बढ़ गई है। पिछले 17 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली-एनसीआर(राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र योजना) को करोड़ों रुपयों की लागत से बनी दो बड़ी सड़कों की सौगात दी और कहा कि आने वाले दिनों में दिल्ली को विकास मॉडल बनाएंगे। इससे पहले भी दिल्ली पर यातायात का दबाव घटाने के लिए मोदी सरकार ने ईस्टर्न पेरिफेरियल एक्सप्रेस-वे, वेस्टर्न पेरिफेरियल एक्सप्रेस-वे, दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस-वे और दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेस-वे बनवाया। दिल्ली मेट्रो रेल दिल्ली और एनसीआर में 416 किलोमीटर तक बन चुका है। इसके विस्तार का काम जारी है।

 

दिल्ली मेट्रो से हर रोज यात्रा करने वालों की औसत संख्या पचास लाख से ऊपर है। यह संख्या 70 लाख भी पार कर जाती है। दिल्ली-मेरठ नमो भारत रेल कोरिडोर के बाद दिल्ली- करनाल और दिल्ली- अरवल कोरिडोर बनने वाला है। इनसे यातायात सुगम होने के साथ-साथ इस इलाके का प्रदूषण भी कम होगा। कायदे में जिस रफ्तार से दिल्ली और एनसीआर की राजधानी की आबादी बढ़ रही है, उसमें इसे बचाने और बनाने के लिए नए फैसले लेने होंगे।

 

दिल्ली की समस्या यह है कि उसका अपना ज्यादा कुछ नहीं है। मौसम भी पड़ोसी राज्यों पर निर्भर है। इतना ही नहीं दिल्ली अपनी जरूरतों को पूरा करने के संसाधनों के लिए भी दूसरे राज्यों पर निर्भर है। 1911 में दिल्ली देश की राजधानी बनी तब दिल्ली की आबादी करीब 2 लाख 38 हजार थी। 1991 में दोबारा विधानसभा बहाल होते समय करीब 94 लाख थी। अब आबादी करीब ढाई करोड़ है और एनसीआर की कुल आबादी की करीब साढ़े चार करोड़ से ज्यादा हो गई है।

 

एनसीआर की आबादी भी मूल रूप से दिल्ली की आबादी ही है। दिल्ली से बाहर बसने वाले ज्यादातर लोग आज भी दिल्ली से ही जुड़े हुए हैं। उनमें ज्यादातर के कारोबार या नौकरी दिल्ली में ही है। निकट भविष्य में इसमें बदलाव होने की संभावना नहीं दिख रही है। दिल्ली की शासन व्यवस्था कम अधिकारों वाली विधानसभा, नगर निगम, महानगर परिषद से 1993 में विधानसभा बनने तक बदलती रही है। अभी भी दिल्ली केन्द्र शासित प्रदेश है और जमीन और पुलिस केन्द्र सरकार के अधीन है। दिल्ली को विकसित करने की जिम्मेदारी दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) को दी गई। 1959 से डीडीए लगातार दिल्ली का मास्टर प्लान बनाती रही है और दिल्ली में लगातार अनधिकृत कालोनी बनती गई। आज हालात ऐसे बन गए कि इन अनधिकृत निर्माण से दिल्ली नियोजित कम और अनियोजित ज्यादा बस गई। वोट और नोट की राजनीति में राजनीतिक दल के नेता भू- माफिया, पुलिस और सरकारी भ्रष्ट कर्मचारियों के सहयोगी बन गए हैं।

 

दिल्ली पर से आबादी का दबाव घटाने और अब बेकार मानी जाने वाली डीडीए को सहयोग देने के लिए डीडीए की तरह ही केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय के अधीन एनसीआर बनाने की योजना तो 1962 में ही बनी लेकिन उसका गठन 1985 में हो पाया। केन्द्रीय शहरी विकासमंत्री इसके अध्यक्ष और दिल्ली के उप राज्यपाल के अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के मुख्यमंत्री इसके सदस्य बनाए गए। एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी इसके सदस्य सचिव होते हैं। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ओमेश सहगल बोर्ड के सदस्य सचिव रहते हुए 1996 में उन्होंने एक मुलाकात में कहा था कि एनसीआर योजना तो फेल हो गई। योजना पर कार्यान्वयन देरी से शुरू हुआ।

 

1985 में बोर्ड बनने पर 2001 की आबादी को लक्ष्य मानकर 1988 में काम शुरू हुआ तब तक योजना से ज्यादा आबादी हो गई थी। एनसीआर के शहरों और दिल्ली के बीच में एक किलोमीटर का गलियारा हरियाली के लिए छोड़ना था। यानी एनसीआर बसना था दिल्ली से हट कर वे बस गए दिल्ली से सटकर। इतना ही नहीं दिल्ली में एक तरह से हर किसी को हर जगह एक तरह से अवैध निर्माण करने की छूट दे दी गई। जो योजनाएं पहले से बनी उसमें तो केवल खामियां ही खामियां हैं। दुनिया के सबसे महंगे इलाके कनाट प्लेस में हर वर्ग के सरकारी कर्मचारियों के लिए फ्लैट बना दिए गए। यह तो मान भी लिया जाए कि गरीब लोगों को खाली जगह पर मुफ्त में सरकार आवास उपलब्ध करवाए लेकिन अमीरों की कई-कई करोड़ की एक-एक अवैध सैनिक फार्म हाउस को भी न तोड़ा जाए, यह समझ से परे है। इतना ही नहीं इसके लिए अदालत से संरक्षण लिया जाए तो भला दिल्ली अवैध निर्माणों से कैसे बच सकती है।

 

यह तो तय सा है कि डीडीए अपना काम करने में विफल रही। न तो उसने ठीक से योजना बनाई और न ही दिल्ली की हजारों एकड़ जमीन की रक्षा कर पाई। कई प्रयास के बावजूद डीडीए के अधिकारी यह तक नहीं बता पाते कि उनकी कितना जमीन पर कब्जा है और कितने वे कब्जे से छुड़ा पाए हैं। डीडीए से भी बुरा हाल तो एनसीआर योजना बोर्ड का है। उसे केवल कागजों में ही मान लिया गया था। 1985 में इसके गठन के समय इसे दिल्ली के 1483 के अलावा हरियाणा के छह जिलों के 13,413,उत्तर प्रदेश के चार जिलों के 10,885 और राजस्थान के 4,493 यानी 30, 240 वर्ग किलोमीटर इलाके को एनसीआर में शामिल किया गया।

 

तब योजना थी कि 2001 में दिल्ली की हो जाने वाली 1,32 लाख आबादी में से 20 लाख आबादी को इन इलाकों में भेजा जाए। इसके लिए इन सभी जगहों में दिल्ली जैसी सुविधा उपलब्ध कराई जाए। इन्हें चार क्षेत्रों में बांटा गया था। हर क्षेत्र के लिए विस्तार से योजनाएं बनाई गई थी। इन इलाकों में स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार के अवसर बढ़ाने के साथ-साथ आवागमन सुलभ कराना प्रमुख था। केन्द्र सरकार के अनेक दफ्तर भी दिल्ली से हटाने थे। इसमें कुछ तो सफलता मिली लेकिन अनियोजित तरीके से काम होने के चलते बहुत लाभ नहीं हुआ। इसके अलावा इन राज्यों के अनेक शहरों को भी मेगनेट(चुंबक) सेंटर की तरह विकसित किया जाना था। तब 2001 में जो आबादी होने का अनुमान लगाया गया था, योजना के शुरू होने के समय ही दिल्ली की आबादी उतनी हो गई थी।

 

ऐसा नहीं है कि बोर्ड की पूरी कवायत ही बेकार हो गई है। अगर दिल्ली सरकार इस पर अपनी केन्द्र सरकार से ठीक से पहल करवाए तो लक्ष्य हासिल हो पाएगा। एनसीआर के हर राज्य की जरूरत इस योजना पर ठोस काम कराने की है लेकिन सबसे ज्यादा जरूरत दिल्ली को है। इसलिए अगुवाई दिल्ली को करनी होगी। कायदे में तो दिल्ली की मौजूदा शासन व्यवस्था पर बहस होकर दिल्ली को पूरा (पूर्ण) राज्य बनाया जाए। अगर ऐसा संभव नहीं हो तो नए कानून बनाकर एनसीआर योजना को ठीक से लागू किया जाए। निगम से केन्द्र तक भाजपा की सत्ता है। अभी जैसा अवसर उसे शायद फिर न मिले। उसका लाभ उसे उठाना चाहिए।

 

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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