अमेरिका में एक भारतीय नारी का साहस

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

 

अमेरिका की धरती आज जिस रूप में एक वैश्विक अवसरों की भूमि के रूप में जानी जाती है, उसमें भारतीय मूल के लोगों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। चाहे बात विज्ञान, तकनीकी नवाचार, शिक्षा, व्यवसाय या सांस्कृतिक विविधता की हो, भारतीय अमेरिकियों ने हर क्षेत्र में अपनी अद्वितीय छाप छोड़ी है। हाल ही में मिसिसिपी विश्वविद्यालय में एक भारतीय मूल की महिला द्वारा अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से आव्रजन नीतियों पर खुले मंच से सवाल पूछना इसी साहस और सामाजिक जागरूकता का उदाहरण है। इस घटना को सिर्फ एक बहस मत मानिए, यह तो उस प्रवासी समुदाय की आवाज थी जो अमेरिका की प्रगति में प्रत्यक्ष योगदान देने के बावजूद नीतिगत भेदभाव का सामना करता है।

 

नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका में 54 लाख (5.4 मिलियन) से अधिक भारतीय एवं भारतीय मूल के लोग रह रहे हैं। यह संख्या उन्हें अमेरिका में चीनी-अमेरिकियों के बाद दूसरा सबसे बड़ा एशियाई जातीय समूह बनाती है। यह समुदाय अमेरिका की कुल आबादी का लगभग 1.6% है। भारतीय अमेरिकी समुदाय उच्च शिक्षा और तकनीकी दक्षता में अग्रणी होने के साथ ही यहां अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए भी रीढ़ की हड्डी साबित हो रहा है।

 

मैनहैटन इंस्टिट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार, एक औसत भारतीय प्रवासी और उसका परिवार अगले 30 वर्षों में अमेरिकी संघीय खज़ाने को लगभग 1.7 मिलियन डॉलर की बचत प्रदान करता है यह सभी प्रमुख प्रवासी समूहों में सबसे ऊँचा आँकड़ा है। यानी चीन के लोग भले ही अमेरिका में अधिक हों, किंतु अमेरिका के खजाने को सबसे अधिक यदि कोई भरता है तो वे भारतीय हैं।

 

भारतीय अमेरिकी पेशेवर विशेष रूप से आईटी, चिकित्सा, वित्त, इंजीनियरिंग और उद्यमिता के क्षेत्र में अग्रणी हैं। उदाहरण के लिए, एच-1बी वीजा कार्यक्रम में लगभग 73 प्रतिशत हिस्सेदारी भारतीयों की रही है, जो उच्च कौशल वाले तकनीकी पेशेवरों का प्रतिनिधित्व करती है। गूगल के सुंदर पिचाई, माइक्रोसॉफ्ट के सत्य नडेला, एडोबी के शांतनु नारायण और आईबीएम जैसी कंपनियों में शीर्ष नेतृत्व में भारतीय मूल के लोग इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय प्रतिभा ने अमेरिकी कॉर्पोरेट परिदृश्य को बदलकर रख दिया है। इसलिए ही बुद्धि कौशल के मामले में सबसे अधिक भारतीयों की डिमांड वहां रहती है।

 

यह भी एक तथ्‍य है, भारतीय अमेरिकियों का औसत वार्षिक पारिवारिक आय अमेरिका के औसत से लगभग 80 प्रतिशत अधिक है। वे अमेरिका की जनसंख्या का 1.5 प्रतिशत होते हुए भी संघीय कर राजस्व में 5 से 6 प्रतिशत योगदान देते हैं। उनके व्यवसायों और स्टार्टअप्स से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से 11 से 12 मिलियन रोजगार अवसर जुड़े हैं। सिलिकॉन वैली में स्थापित हर चौथे स्टार्टअप की नींव किसी भारतीय या भारतीय मूल के उद्यमी ने रखी है। कहना होगा कि यह भारतवंशियों के नवाचार-केन्द्रित दृष्टिकोण का परिचायक है।

 

अब बात अमेरिका की आव्रजन नीति की। वस्‍तुत: ये लंबे समय से राजनीतिक विवादों का विषय रही है। विशेषकर डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के दौरान कड़े प्रतिबंधों और “America First” नीति के कारण कई वैध प्रवासी भी प्रभावित हुए हैं। इन नीति ने भारतीय समुदाय में असुरक्षा की भावना बढ़ाई है, जबकि अधिकांश भारतीय प्रवासी पूरी तरह वैधानिक प्रक्रिया से अमेरिका पहुंचे हैं, फिर भी “इमिग्रेशन सख्ती” की लहर ने उन्हें भी अपने अस्तित्व के लिए सजग और संगठित होने पर मजबूर किया है।

 

इसी संदर्भ में मिसिसिपी विश्वविद्यालय की वह घटना विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिसमें एक भारतीय मूल की महिला ने उपराष्ट्रपति वेंस से सार्वजनिक मंच पर सवाल किया; “हम नियमों से आए हैं, मेहनत से जी रहे हैं, तो हमें बाहर क्यों किया जा रहा है?” यह प्रश्न मात्र भावनात्मक नहीं है, यह अमेरिका के लोकतांत्रिक मूल्य, समानता और न्याय के सिद्धांतों को पुनः परिभाषित करने का आह्वान है। वेंस ने जब उत्तर दिया कि “कम प्रवासी आने चाहिए ताकि देश का सामाजिक ढांचा बचा रहे,” तो यह तर्क बहुसांस्कृतिक समाज की जटिलताओं को समझने में विफल रहा। क्‍योंकि अमेरिका का इतिहास बताता है कि विविधता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति रही है और भारतीय प्रवासियों ने इस विविधता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। यदि भारतीय अमेरिका नहीं जाते तो आज अमेरिका जिस विकसित रूप में दिखाई देता है, वह भी नहीं होता!

 

इसी तरह से कार्यक्रम के दौरान महिला द्वारा उपराष्ट्रपति के अंतरधार्मिक विवाह पर सवाल उठाना भी भारतीय प्रवासियों के सांस्कृतिक आत्मबोध को दर्शाता है। भारतीय समुदाय अपनी धार्मिक आस्था, पारिवारिक मूल्य और सांस्कृतिक जड़ों को सहेजते हुए भी अमेरिकी समाज में गहराई से रच-बस गया है। जैसा कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस की पत्नी उषा वेंस को हम देख सकते हैं, जो पूरी तरह से हिन्‍दू धर्म का पालन करती हैं। इसी तरह से अनेक भारतीय मूल के अमेरिकी हैं जो यहां सांस्कृतिक एकता और वैश्विक सौहार्द का संदेश मजबूत कर रहे हैं।

 

भारतीय अमेरिकियों ने व्यवसाय और तकनीकी जगत के साथ ही राजनीति और सामाजिक नेतृत्व में भी सक्रिय भूमिका निभाई है। इस दृष्टिकोण से कई नाम देखे जा सकते हैं। कमला हैरिस, अमी बेरा, प्रमिला जयपाल, रो खन्ना, राजा कृष्णमूर्ति, श्री थानेदार, अरुणा मिलर, विवेक मूर्ति निक्की हेली बॉबी जिंदल, प्रीति भरगावा, सीमा वर्मा, काश्यप (कश) पटेल, विवेक रामास्वामी, सुहास सुब्रमण्यम, रिचर्ड आर. वर्मा, प्रीति बंसल, अंजली चतुर्वेदी, माला अडिगा, सेमी वर्मा, नील कशकारी और ऐसे ही अन्‍य नाम हैं। आज कई भारतीय अमेरिकी अब अमेरिकी कांग्रेस, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों में निर्वाचित होकर नीति निर्माण की मुख्यधारा में हैं।

 

नई पीढ़ी के भारतीय अमेरिकी छात्र विश्वविद्यालयों में शिक्षा, शोध और नवाचार में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। वे सामाजिक न्याय, जलवायु परिवर्तन, मानवाधिकार और तकनीकी नैतिकता जैसे विषयों पर अग्रिम सोच रखते हैं। यह प्रवृत्ति बताती है कि भारतीय समुदाय यहां सिर्फ आर्थिक सफलता तक सीमित नहीं है, अमेरिकी लोकतंत्र की मूल चेतना का भी पूर्ण हिस्सा बन चुका है।

 

अत: वर्तमान संदर्भ में यदि कुछ शब्‍दों में हम समझें तो भारतीयों का ज्ञान, साहस, बुद्धिमत्ता और श्रम, समृद्ध‍ि बल ही अमेरिका की सफलता की कहानी का अभिन्न अध्याय है। यहां रह रहे भारत वासियों ने अपने परिश्रम, शिक्षा और नैतिक आचरण से यह सिद्ध किया है कि किसी भी देश की प्रगति केवल नीतियों पर नहीं, बल्कि लोगों की लगन और समर्पण पर निर्भर करती है।

 

वस्‍तुत: आज आवश्यकता इस बात की है कि अमेरिकी इमिग्रेशन नीति भारतीय समुदाय के इस योगदान को पहचाने और उसके अनुरूप सम्मान व अवसर सुनिश्चित करे। मिसिसिपी की ये घटना भारतीयों का साहस है। जो लोग अमेरिका की “America First” नीति के नाम पर भारतीयों पर जुल्‍म कर रहे हैं, वे समझ जाएं कि ऐसा करके वे अपने देश को ही कमजोर कर रहे हैं।

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