इस्‍लामिक आतंकवाद का अदृश्य हथियार हैं महिलाएं

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

 

पिछले कई दशकों से इस्‍लामिक आतंकवादी संगठन महिलाओं को भर्ती कर रहे हैं और उनका क्रूर शोषण कर रणनीतिक लाभ उठा रहे हैं। यह समस्या अब इतनी विकट हो गई है कि ये किसी एक देश तक सीमित नहीं रही, आईएसआईएस से बोको हराम, जैश-ए-मोहम्मद तक हर संगठन ने महिलाओं को प्रचार, जासूसी, लॉजिस्टिक्स और आत्मघाती हमलों में झोंक दिया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) मॉनिटरिंग टीम की ताजा रिपोर्ट चेतावनी देती है कि इस्‍लामिक आतंकवादी नेटवर्क ऑनलाइन प्रचार के जरिए किशोरियों और महिलाओं को लक्षित कर रहे हैं, जो वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है।

 

वस्‍तुत: इसमें भी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस जटिल मुद्दे को कट्टरपंथ, राजनीतिक हिंसा और लैंगिक शोषण के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए था, जिसका अब तक सर्वत्र अभाव नजर आता है। किंतु आज यूएनएससी की रिपोर्टें महिलाओं की बढ़ती भागीदारी पर गहरी चिंता व्यक्त कर रही हैं। यूएन की जो टीम, अल-कायदा, आईएसआईएल और उनके सहयोगियों पर नजर रखती है, दरअसल वे स्‍पष्‍ट कह रही हैं कि आतंकवादी महिलाओं का ऑनलाइन भर्ती, फंडिंग, लॉजिस्टिक्स और यहां तक कि ऑपरेशनल भूमिकाओं में इस्तेमाल कर रहे हैं। यूएनओडीसी और यूएन वुमन की रिपोर्टें बताती हैं कि महिलाएं कभी पीड़ित के रूप में, कभी समर्थक और कभी सक्रिय भागीदार के रूप में उभरती हैं।

 

इस संदर्भ में 2018 और 2022 की यूएनएससी काउंटर-टेररिज्म कमिटी की चर्चाओं ने जोर दिया कि ‘वन-साइज-फिट्स-ऑल’ दृष्टिकोण यहां काम नहीं करता। हालिया 37वीं रिपोर्ट (फरवरी-2026) में जैश-ए-मोहम्मद के महिला विंग ‘जमात-उल-मोमिनात’ का खुलासा हुआ है, जिसकी घोषणा मसूद अजहर ने आठ अक्टूबर 2025 को की थी। यह विंग महिलाओं को प्रशिक्षित कर हमलों में सहायता प्रदान करने का लक्ष्य रखता है, जो सुरक्षा एजेंसियों की नजर चकमा देने की रणनीति है। दिल्ली के लालकिला मेट्रो स्टेशन धमाके (10 नवंबर 2025, 15 मौतें) और जुलाई 2025 के पहलगाम हमले (26 मौतें) से इसका सीधा संबंध प्रमाणित हो चुका है।

 

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो आईएसआईएस ने ‘अल-खांस ब्रिगेड’ जैसी महिला इकाइयां बनाकर प्रचार और निगरानी में उनका उपयोग किया। मिया ब्लूम की पुस्तक ‘बॉम्बशेल: वुमेन एंड टेररिज्म’ में लिखा भी इसलिए गया कि “आतंकवादी संगठनों ने सीख लिया है कि महिलाएं रणनीतिक लाभ प्रदान करती हैं क्योंकि वे कम संदिग्ध मानी जाती हैं और सुरक्षा उपायों को बायपास कर सकती हैं।” नाइजीरिया का बोको हराम साल 2014 के बाद सैकड़ों किशोरियों को जबरन आत्मघाती हमलों में धकेल चुका है। यूएनआईसीईएफ की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे हमलों में लड़कियां बहुसंख्यक थीं।

 

दक्षिण एशिया, खासकर कश्मीर, इस शोषण का सबसे दर्दनाक केंद्र रहा है। निला अली खान की ‘इस्लाम, वुमेन एंड वायलेंस इन कश्मीर’ में कहा गया, “संघर्ष क्षेत्रों में महिलाएं उग्रवादी समूहों और राज्य ताकतों के बीच फंसकर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रतीक बन जाती हैं।” फरहाना काजी की ‘इनविजिबल मार्टर्स’ चेताती है, “महिला आत्मघाती हमलावरों का कोई एक प्रोफाइल नहीं, उनके पीछे व्यक्तिगत आघात से राजनीतिक विश्वास तक कारक होते हैं।” स्वाति पराशर का ‘जेंडर, जिहाद एंड जिंगोइज्म’ तर्क देता है कि महिलाएं हिंसा की शिकार ही नहीं, अपितु हिंसा की एजेंट भी हो सकती हैं।

 

भारत में पिछले 75 वर्षों (1951-2026) का इतिहास चिंताजनक है। 1990 के कश्मीरी पंडितों के विस्थापन से हुर्रियत, जेईएम और लश्कर-ए-तैयबा ने महिलाओं को कूरियर, हनीट्रैप और सुसाइड बॉम्बर बनाया। साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल दर्जनों मामलों का उल्लेख करता है, जहां महिलाओं को ‘अदृश्य हथियार’ के रूप में इस्‍तेमाल किया गया है। जमात-उल-मोमिनात आईएसआईएस-हमास की तर्ज पर वैश्विक अस्थिरता फैलाने में सक्रिय है, जो एलटीटीई की महिला स्क्वायड की याद दिलाता है। भारत सहित विश्व समुदाय के लिए चुनौती है, सुरक्षा कार्रवाइयों के साथ सामाजिक समरसता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने की ये चुनौती बहुत व्‍यापक है।

 

भारत के प्रमुख मामलों पर नजर डालें तो इशरत जहां (2004) लश्कर की सुसाइड स्क्वायड मेंबर थी, जिसे गुजरात के तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री नरेन्द्र मोदी (अब प्रधानमंत्री) पर हमले के लिए डेविड हेडली ने मुजम्मिल बट के नेतृत्व में भेजा था। जो आज एनआईए जांच और हेडली के बयान से सिद्ध भी हो चुका है। 2006 में जेईएम की यासमीना अवंतीपोरा हाईवे पर पहली कश्मीरी महिला सुसाइड बॉम्बर बनी। उसी साल खलीदा अख्तर लश्कर के हनीट्रैप और हथियार प्रशिक्षण में लिप्त रही।

 

हाल के वर्षों में डॉ. शाहीन सईद (2025), लखनऊ की रहने वाली, जमात-उल-मोमिनात की रिक्रूटर साबित हुई। लालकिला ब्लास्ट से पहले गिरफ्तार, उसकी कार में राइफल और डीएनए से डॉ. उमर नबी का लिंक मिला। निघत सिद्दिकी हालिया श्रीनगर में लश्कर कमांडरों को तीन लाख रुपये देते हुए पकड़ी गई। ये मामले एनआईए, जेके पुलिस और यूएन रिपोर्टों से प्रमाणित हैं, हालांकि हर आरोप अदालती फैसले पर निर्भर है और जांच प्रक्रिया लंबी रहती है, अनेक मामलों में तो न्‍यायालय से अभी अंतिम निर्णय भी आना है, किंतु अनेक साक्ष्‍य एवं प्रमाण सामने आ चुके हैं कि कैसे महिलाओं को इस्‍लाम के नाम पर जिहाद को गैर मुसलमानों के प्रति हथियार के रूप में इस्‍तेमाल किया जा रहा है।

 

कई अन्‍य पुस्तकें हैं, जिसमें इस शोषण की मनोवैज्ञानिक गहराई उजागर की गई है। मुश्ताक उल हक की ‘शैडोएड वर्ल्ड ऑफ टेररिज्म’ कहती है कि “महिलाओं के हिंसक चयन के पीछे कोई एक कारण नहीं- दुख, विचारधारा और जबरदस्ती का जाल है।”

 

वस्‍तुत: आज ये सभी विश्लेषण साबित करते हैं कि महिलाओं को वर्तमान समय में सिर्फ पीड़ित मानना भूल होगी; वे बहुआयामी भूमिकाएं निभा रही हैं, आतंकवाद का हिंसक स्‍वरूप भी उन्‍हीं में से एक है। हालांकि यह भी सच है कि आतंकवाद और इस्‍लामिक पंथ के बीच मुख्यधारा के मजहबी विद्वान इन व्याख्याओं को अस्वीकार करते हैं। इनका मत है कि ‘इस्लाम के नाम पर’ कहना सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ाता है और वास्तविक समस्या कट्टरपंथ से भटकाता है। किंतु अब इस सच को भी तो नहीं नकारा जा सकता कि जो घटनाएं हो रही हैं वे अधिकांशत: एक विशेष समुदाय की सहभागिता को ही बार-बार उजागर करती हैं।

 

वैसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की ओर से इस समस्‍या का निदान भी बताया गया है। नीतिगत उपायों में जेंडर-संवेदी डी-रेडिकलाइजेशन, साइबर निगरानी, संघर्ष क्षेत्रों में महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा-पुनर्वास कार्यक्रम और यूएन-एफएटीएफ-इंटरपोल सहयोग शामिल हैं। यूएनएससी ने शांति निर्माण में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर देता है।

 

ऐसे में कहना यही होगा कि आतंकवाद में महिलाओं का शोषण जटिल बहुस्तरीय समस्या है; इसका समाधान सुरक्षा, लैंगिक न्याय और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता में है। सिर्फ तभी हम इस काले अध्याय को बंद कर सकेंगे। अन्‍यथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) जैसे तमाम अंतरराष्‍ट्रीय एवं राष्‍ट्रीय संगठनों, जांच एजेंसियों की ताजा रिपोर्ट आती रहेंगी, पर महिला या किसी भी रूप में ये आतंकवाद समाप्‍त नहीं होगा।x

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