होर्मुज से कांडला तक संकट के बीच भारत की ऊर्जा आपूर्ति

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

यह हम सभी देख रहे हैं कि आज अमेरिका, ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर गहरा प्रभाव डाला है। ऐसे संवेदनशील समय में भारतीय ध्वज वाला एलपीजी जहाज ‘जग विक्रम’ एवं अन्य जहाजों का सुरक्षित रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य पार करते हुए उनके तय स्थान (बंदरगाह) तक पहुंचना निश्चित ही भारत की संतुलित और प्रभावी कूटनीति का प्रतीक बनकर दुनिया के सामने आया है। इससे पहले हमने एमटी नंदा देवी, शिवालिक को एलपीजी टैंकर लेकर होर्मुज जलडमरूमध्य को पार करते हुए देखा, दोनों जहाजों को ईरान ने सुरक्षित मार्ग दिया। ये एक साथ भारत की ओर बढ़े और देश की ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाा को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई।

कहना होगा कि युद्ध जैसे हालात में इस मार्ग से किसी भी जहाज का सुरक्षित निकलना चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में आज ‘जग विक्रम’ का सुरक्षित पारगमन यह संकेत देता है कि भारत ने समुद्री सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय संवाद और सामरिक संतुलन का प्रभावी उपयोग किया है। अत: भारत ने जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में भी अपने समुद्री हितों की रक्षा की है। इसके साथ ही यह भी ध्यान में आया है कि भारत अब तक अपने 2,177 नाविकों को सुरक्षित स्वदेश लेकर आ चुका है। यह आंकड़ा आज हर उस परिवार को राहत दे रहा है, जोकि अपने प्रियजनों की वापसी का इंतजार कर रहा था। साथ ही विदेश मंत्रालय और भारतीय मिशनों ने चौबीसों घंटे हेल्पलाइन और जमीनी प्रयासों के जरिए यह सुनिश्चित किया गया है कि कोई भी भारतीय नागरिक संकट में अकेला नहीं रहेगा।

वस्तुत: डीजी शिपिंग कंट्रोल रूम द्वारा 6,073 कॉल्स और 12,867 ईमेल्स को संभालना इस बात का प्रमाण भी है कि कैसे संकट के समय प्रभावी संचार कितना महत्वपूर्ण होता है। इस दिशा में भारत सरकार के प्रयास अत्यधिक सराहनीय कहे जा सकते हैं। यह दर्शाता है कि भारत ने सक्रिय रूप से स्थिति को नियंत्रित किया हुआ है, इसलिए आज यह तंत्र संकट प्रबंधन में एक मजबूत मॉडल के रूप में उभर सका। वहीं, देश के सभी बंदरगाहों पर कामकाज सामान्य रूप से जारी रहना भारत की आर्थिक और प्रशासनिक स्थिरता को दर्शाता है। पश्चिमी तट पर वेस्ट एशिया से जुड़े 3,383 कंटेनरों में से 3,228 की वापसी सुनिश्चित कर दी गई है। शेष 155 कंटेनर तकनीकी कारणों से लंबित हैं, किंतु कहीं भी जाम या देरी नहीं है। इसका मतलब साफ है कि वर्तमान वैश्विक संकट के समय में भी भारत ने अपने लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को मजबूत बनाए रखा है।

अंतर-मंत्रालयीय सामूहिक शक्ति का प्रदर्शन

पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय का विदेश मंत्रालय और खाड़ी क्षेत्र में भारतीय मिशनों के साथ में मिलकर काम करना आज इस बात का उदाहरण है कि कैसे समन्वित प्रयास बड़े संकटों को नियंत्रित कर सकते हैं। देखने में आया कि यह सहयोग- प्रशासनिक, योजना निर्माण, क्रिया के स्तर पर एक साथ पूरे समन्वित रूप में कार्य कर रहा है। इस युद्ध के बीच एक अच्छी बात यह भी दिखाई दे रही है कि भारत घटनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं दे रहा, वह सक्रिय रूप से कूटनीतिक समाधान तलाश रहा है।

दुनिया देख रही है कि भारत ने इस पूरे संकट में किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय संतुलित और तटस्थ रुख अपनाया हुआ है। यही उसकी सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत बनकर आज उभरा है। अमेरिका, ईरान और इजराइल तीनों के साथ संवाद बनाए रखना और अपने हितों की रक्षा करना भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट” नीति का एक सफलतम उदाहरण है। साथ में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा, मदद और भलाई सुनिश्चित करने के लिए 24 घंटे हेल्पलाइन और नियमित सलाह जारी करना यह दर्शाता है कि भारत की कूटनीति मानवीय भी है।

संकट में अवसर की पहचान

होर्मुज जलडमरूमध्य के तनावपूर्ण माहौल में ‘जग विक्रम’ की सुरक्षित यात्रा, हजारों भारतीय नाविकों की वापसी और बंदरगाहों का सुचारू संचालन, हम कह सकते हैं कि ये सभी घटनाएं मिलकर एक बड़ी स्वरूप हमारे सामने खड़ा कर रहे हैं और वो यह है कि भारत की कूटनीतिक परिपक्वता, रणनीतिक संतुलन और मानवीय दृष्टिकोण यह बताता है कि केंद्र सरकार की नीति एवं योजनाएं सही दिशा में आगे बढ़ रही हैं।

कुल सार रूप में कहना यही है कि जब दुनिया संघर्ष और अस्थिरता के दौर से गुजर रही है, तब भी भारत अपने एक-एक नागरिक की बराबर चिंता कर रहा है, उनकी एवं उसके परिवार की निरंतर ऊर्जा जरूरत पूरी होती रहे, इसके लिए जहां जैसे संभव हो रहा है, वहां, वह नए रास्ते बना रहा है। सबक यह है कि शांतिपूर्ण संवाद, संतुलित नीति और मजबूत प्रशासनिक ढांचा किसी भी संकट को अवसर में बदल सकता है। फिलहाल इस दिशा में मोदी सरकार की नीति सही दिशा में सफलता के साथ आगे बढ़ती हुई दिखाई दे रही है।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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