**स्कूल बंद होने से बढ़ी चिंता**

0

 

 

विधानसभा में शिक्षा मंत्री सकीना इत्तू द्वारा साझा की गई जानकारी, जिसमें बताया गया कि 2022 से अब तक 3,192 सरकारी स्कूलों में 10 से कम नामांकन हैं और इनमें 2,518 शिक्षक तैनात हैं, एक चिंताजनक स्थिति की ओर इशारा करती है। वह भाजपा विधायक रणबीर सिंह पठानिया के प्रश्न का उत्तर दे रही थीं। विस्तार से देखें तो जम्मू संभाग में 1,494 स्कूलों में 1,934 शिक्षक होने के बावजूद 10 से कम नामांकन दर्ज किया गया, जबकि कश्मीर संभाग में 1,698 ऐसे स्कूल हैं जिनमें 584 शिक्षक कार्यरत हैं।

 

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जम्मू-कश्मीर में कम नामांकन के कारण 1,732 सरकारी स्कूलों को बंद या विलय कर दिया गया है। इस प्रवृत्ति पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि हर एक सरकारी स्कूल का बंद होना गरीब तबके के बच्चों और दूरदराज़ व ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले विद्यार्थियों से शिक्षा के अवसर छीनने जैसा है, जहाँ उनके पास पढ़ाई का कोई अन्य विकल्प नहीं होता।

 

हालांकि शिक्षा मंत्री ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि सरकार और स्कूल बंद करने की योजना बना रही है या नहीं, लेकिन प्रस्तुत आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि प्रशासन इस दिशा में सोचने के दबाव में है।

 

सरकारी स्कूलों में कम नामांकन निश्चित रूप से गंभीर चिंता का विषय है, लेकिन इसे आधार बनाकर स्कूलों को बंद करना उचित नहीं ठहराया जा सकता। ऐसे निर्णय लेने से पहले यह समझना जरूरी है कि शिक्षा को केवल लाभ-हानि के दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता।

 

दूरदराज़ इलाकों में स्थित ये स्कूल, जहाँ शिक्षा उपलब्ध कराना पहले से ही कठिन है, किसी भी तरह से अनावश्यक नहीं हैं, बल्कि ये कई लोगों के लिए जीवनरेखा का काम करते हैं। इतिहास गवाह है कि जो सरकारें शिक्षा पर खुलकर खर्च करती हैं, वे अपने देश को प्रगति के नए शिखरों तक ले जाती हैं। इसलिए जम्मू-कश्मीर सरकार को भी शिक्षा नीति बनाते समय आर्थिक लाभ-हानि के बजाय समाज के हित को प्राथमिकता देनी चाहिए और उन क्षेत्रों में स्कूल स्थापित करने चाहिए जहाँ अभी भी यह सुविधा उपलब्ध नहीं है।

 

जहाँ तक इन स्कूलों पर होने वाले वेतन खर्च का सवाल है, उसे संसाधनों की बर्बादी नहीं बल्कि मानव पूंजी में निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए। यह मुद्दा अत्यंत महत्वपूर्ण है और सरकार का निर्णय पूरे केंद्र शासित प्रदेश के भविष्य को प्रभावित कर सकता है। शिक्षित और अशिक्षित युवाओं के बीच का अंतर बहुत बड़ा होता है, इसलिए सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आगे कोई भी स्कूल बंद न हो, क्योंकि आज जिन स्कूलों में नामांकन शून्य है, वे भविष्य में सैकड़ों छात्रों से भर सकते हैं।

 

अंततः, इस आधार पर सरकारी स्कूलों को बंद करना एक व्यावहारिक दृष्टिकोण नहीं है, बल्कि इसे एक तरह की हार के रूप में देखा जाना चाहिए।

Leave A Reply

Your email address will not be published.