शिक्षा बजट में समाज-विज्ञानों पर ध्यान देने की जरूरत

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– गिरीश्वर मिश्र

 

अंग्रेज़ों से स्वतंत्रता मिलने के समय भारत को एक पिछड़ा और तीसरी दुनिया का देश मान कर उसके लिए ‘विकास‘ को जरूरी कदम ठहराया गया। इस क्रम में विकास को पश्चिमी देशों की स्थिति के अनुसार पहचाना और परिभाषित किया गया। इसके अनुरूप विकसित भारत के रूपांतरण के लिए आधुनिक भारत में शिक्षा की योजना में प्राकृतिक विज्ञानों और प्रौद्योगिकी पर ज़्यादा बल दिया जाता रहा। इसी बात को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण या मनोवृत्ति (साइंटिफ़िक टेम्पर) अपनाने की बात भी की जाती रही है। इसके लिए अभियान भी चले। आज भी यह फैशन में है और बहुतों की नजर में भारतीयता या भारतीय ज्ञान संपदा वैज्ञानिक मनोभाव के लिए खतरा है। साथ ही समस्याओं के समाधान के लिए प्रौद्योगिकी के अध्ययन पर भी विशेष बल दिया गया। इसी क्रम में व्यावसायिक शिक्षा के विविध पक्षों (जैसे-कानून, चिकित्सा, प्रबंधन आदि) की ओर भी ध्यान दिया गया, अनेक संस्थाएं खड़ी हुईं और अनेक उच्चस्तरीय शिक्षा संस्थानों की नींव पड़ी और इसका क्रम आगे भी जारी है।

 

आम जनता में भी यही क्रम प्रचारित-प्रसारित होता रहा और यही छवि स्वीकार की गई। विज्ञान और प्रौद्योगिकी को आर्थिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण माना गया। इस कारण छात्रों और उनके अभिभावकों की रुझान भी इसी दिशा ओर बढ़ती रही। इसी वरीयता क्रम के साथ सरकार की ओर से शिक्षा के लिए संसाधन भी मुहैया किए जाते रहे। सामाजिक विज्ञानों और मानविकी पर अध्ययन-अनुसंधान के लिए कोई ख़ास तवज्जो नहीं रहा। इसके परिणामस्वरूप सामाजिक विज्ञानों के लिए आवश्यक सुविधा और अनुदान के लिए सहयोग भी अपेक्षाकृत कम मात्रा में मिलता रहा।

 

गौरतलब है कि समाज हर तरह के विकास की कसौटी है और लक्ष्य भी। अंततः सारी योजनाएं और आयोजन समाज की स्थिति को सुधारने और जीवन की गुणवत्ता सुधारने से जुड़ी होती हैं। सामाजिक परिवर्तन को किसी तरह नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता। हर समाज में निरंतरता और परिवर्तन दोनों होते रहते हैं। ऐसे में समाज की गतिविधि और उसकी संस्थाओं को समझना और उनमें सुधार की निरंतर जाँच पड़ताल होती रहनी चाहिए।

 

दरअसल, समाज का उद्विकास (इवोल्यूशन) होता है, यानी जो है उसमें से फिर पनपता है। बाहर से आरोपित होने पर वह आत्मसात नहीं हो पाता है। इसलिए बिना जाने-समझे परम्परागत ज्ञान की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। केवल प्राकृतिक विज्ञानों से ही सामाजिक विकास का लक्ष्य नहीं पूरा हो सकता। समाज भी कई स्तरों पर संचालित होता है। समुदाय, देश के अंदर, देश के बाहर, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले परिवर्तन एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। इसलिए समाज विज्ञानों और मानविकी का अध्ययन आवश्यक है।

 

समाज गतिशील संरचना है। इसलिए समय के साथ सहयोग और संघर्ष भी बढ़ते हैं।

 

शिक्षा समाज की अत्यंत महत्वपूर्ण आवश्यकता होती है और भारत में अति प्राचीनकाल से इसकी समृद्ध परम्परा रही है। यहाँ विश्व प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र और गुरुकुल रहे हैं। जब अंग्रेज़ आए थे तो उन्हें भारत में एक अच्छी शिक्षा मौजूद मिली थी। परंतु उन्होंने अपने शासन को स्थापित करने के लिए देश के मानस को बदलने की ज़रूरत महसूस की और ऐसी शिक्षा को यहाँ रोपा जो समाज को उसकी संस्कृति से काट दे। इसलिए औपनिवेशिक शिक्षा में अंग्रेजों ने अपने हित के अनुसार भारतीय शिक्षा को उखाड़ दिया था। वह हाशिए पर पहुँच गई और उसकी जगह पश्चिमी शिक्षा को स्थापित किया था। औपचारिक रूप से उसे आजीविका से भी जोड़ दिया गया। शिक्षा का माध्यम भी विदेशी भाषा अंग्रेज़ी को बना दिया गया। इसका अभ्यास लगभग दो सदियों में इस तरह सुदृढ़ किया गया कि भारतीय भाषाएँ अनौपचारिक प्रयोग का विषय बनकर रह गईं और शिक्षा में आगे बढ़ने के लिए अंग्रेज़ी अनिवार्य हो गई। इस तरह विषय वस्तु, सिद्धांत और उसके अध्ययन और शोध के लिए माध्यम के रूप में अंग्रेजी का प्रचार-प्रसार लगातार बढ़ता गया। इस प्रक्रिया ने अंग्रेजी की प्रतिष्ठा को ठोस आधार प्रदान किया। इसने लोगों की सांस्कृतिक अभिरुचि और सांस्कृतिक ज्ञान दोनों को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया। उसी की व्यवस्था में भारतीय शिक्षा जकड़ती चली गई।

 

इस पाश्चात्य मॉडल की शिक्षा को वैश्विक मान लिया गया और उसी रूप में इसके प्रति हमारी श्रद्धा बनती गई जबकि सभी विकसित देशों में शिक्षा का आयोजन स्वाभाविक रूप से उनकी अपनी भाषा और उनकी अपनी संस्कृति से जुड़ कर ही किया जाता रहा। भारत द्वारा स्वीकार की गई नई शिक्षानीति समावेशी दृष्टि अपनाते हुए देश की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को बौद्धिक और सामाजिक संसाधन की तरह देखती है। इसके अंतर्गत स्थानीय और राष्ट्रीय परिदृश्य को स्थान दिया गया है। यह भी एक महत्वपूर्ण संकल्प किया गया है कि मातृभाषाओं को शिक्षा प्रक्रिया के केंद्र में लाया गया है। देश में संपर्क, सौहार्द और समरसता लाने के लिए त्रिभाषा सूत्र को अमल में लाने के लिए यत्न किया जा रहा है। साथ ही शिक्षा नीति में भारत की विशाल सांस्कृतिक विरासत के साथ सक्रिय संवाद स्थापित करने का अधिकाधिक अवसर बनाया गया है। इन बातों को ध्यान में रखकर नए बजट में शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। अब तक शिक्षा के लिए नगण्य प्रावधान होता रहा है। युवा भारत को कुशल और सक्षम मानव संसाधन में रूपांतरित करने के लिए उदारतापूर्वक संसाधन उपलब्ध कराने होंगे। आशा है भारत सरकार इस दिशा में ज़रूरी व्यवस्था करेगी।

 

(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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