लापरवाही से टल गई बड़ी त्रासदी
गुलमर्ग गोंडोला में सोमवार को लगभग 320 पर्यटकों के हवा में फंस जाने की भयावह घटना केवल एक तकनीकी खराबी नहीं थी, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही और कश्मीर के सबसे प्रतिष्ठित पर्यटन स्थलों में सुरक्षा प्रबंधन की कमजोर स्थिति का बड़ा संकेत थी। हालांकि सफल रेस्क्यू ऑपरेशन ने एक बड़ी त्रासदी टाल दी, लेकिन इस घटना ने गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है, जिनके लिए सरकार जवाबदेही से बच नहीं सकती।
कई घंटों तक महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग पर्यटक सैकड़ों फीट ऊंचाई पर हवा में लटके रहे, जब दोपहर करीब 1:20 बजे तकनीकी खराबी के कारण केबल कार सेवा रुक गई। मौसम खराब होने और अनिश्चितता बढ़ने के साथ केबिनों में दहशत फैल गई। यदि स्थिति और बिगड़ जाती, तो घाटी हाल के वर्षों की सबसे बड़ी पर्यटन त्रासदियों में से एक की गवाह बन सकती थी।
सरकार अब रेस्क्यू ऑपरेशन की सफलता का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर सकती है, लेकिन असली सवाल यह है कि आखिर इतनी खतरनाक स्थिति पैदा ही क्यों होने दी गई? गुलमर्ग गोंडोला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर पर्यटन के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया जाता है और हर सीजन हजारों पर्यटक यहां आते हैं। यदि इतनी महत्वपूर्ण परियोजना में इतनी बड़ी तकनीकी विफलता हो सकती है, तो जम्मू-कश्मीर की अन्य सार्वजनिक परियोजनाओं में सुरक्षा निगरानी और रखरखाव की स्थिति पर गंभीर सवाल उठते हैं।
जम्मू-कश्मीर पुलिस, राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल, भारतीय सेना और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल द्वारा दिखाए गए साहस और पेशेवर रवैये की सराहना की जानी चाहिए। उनकी त्वरित कार्रवाई ने लोगों की जान बचाई और स्थिति को बड़े हादसे में बदलने से रोका। लेकिन बचाव कर्मियों की बहादुरी प्रशासनिक विफलताओं को छिपाने का माध्यम नहीं बननी चाहिए।
रिपोर्टों के अनुसार लगभग 45 शारीरिक रूप से अस्वस्थ पर्यटकों को खराब मौसम और कठिन रास्तों के बीच स्ट्रेचर के सहारे नीचे लाया गया। इससे यह सवाल खड़ा होता है कि गोंडोला प्रणाली के भीतर प्रभावी आपातकालीन निकासी व्यवस्था क्यों मौजूद नहीं थी। जिस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर निर्भर हो, वहां ऐसे संकट में केवल मैनुअल रेस्क्यू ऑपरेशन पर निर्भर रहना कमजोर तैयारी और पुरानी सुरक्षा योजना को दर्शाता है।
पर्यटन केवल प्रचार अभियानों के सहारे नहीं चल सकता। सरकार लगातार कश्मीर को सुरक्षित और विश्वस्तरीय पर्यटन स्थल बताती रही है, लेकिन ऐसी घटनाएं सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच खतरनाक अंतर को उजागर करती हैं। जनता यह जानना चाहती है कि रखरखाव शेड्यूल, सुरक्षा ऑडिट, तकनीकी निरीक्षण और इस विफलता की जवाबदेही किसकी है।
यह केवल एक टला हुआ हादसा नहीं था, बल्कि एक गंभीर चेतावनी थी। जम्मू-कश्मीर के लोगों और देशभर से आने वाले पर्यटकों को ऐसी बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए जो प्रशासनिक लापरवाही से ऊपर मानव जीवन को प्राथमिकता दें। यदि अब भी सबक नहीं लिया गया, तो अगली घटना राहत और शुक्रगुजारी के बजाय शोक और पछतावे में बदल सकती है।