भगवान् परशुरामः अन्याय,अत्याचार एवं दमनकारी वृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष के प्रतीक

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-डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा

त्रैता युग में जब परात्पर ब्रह्म के श्रीराम रुप में अवतरित होने पर संपूर्ण सृष्टि अलौकिक आनन्द वैभव से ओतप्रोत थी, और सब तरफ सात्विक भावों की प्रधानता थी, किंतु तब ऐसे ऊर्जा वान स्वर्णिम समय में भी मदोन्मत्त क्षत्रिय सत्ताधीषों की आतंक, अत्याचार एवं दमनकारी कुत्सित मनोवृत्ति के चलते भय और अशांति का वातावरण निर्मित हो गया था, तब उस भीषण काल में भगवान् परशुराम का अभ्युदय हुआ, जिन्होंने सभी पाशविक वृत्तियों को पराभूत कर पृथ्वी पर अहिंसा, शांति और सद्भाव की स्थापना की।

रक्तरंजित एवं विप्लवकारी कालखंड के उस विकराल दौर में दुष्ट, अहंकारी एवं अत्याचारी सत्ताधीशों का बाहुल्य हो गया था और उनके द्वारा ऋषि मुनि, गौ और ब्राह्मणों को असह्य पीड़ा पहुंचाई जाने लगी थी, तब अन्याय, अत्याचार, आतंक और व्यथा की उन विषम परिस्थितियों में सर्वशक्तिमान विश्वात्मा भगवान् श्रीहरि ने भृगुवंशियों में परशुराम के रूप में अवतार ग्रहण किया। भगवान् श्री विष्णु के छठवें अवतार के रूप में इस धराधाम पर अवतरित हुए पशुराम महाराज ने शिव प्रदत्त अपने अमोघ, विकराल परशू से आतंक की जड़ पर महाभीषण प्रहार करते हुए पृथ्वी के भारभूत राजाओं का नाश कर पृथ्वी का भार उतार दिया। भगवान् परशुराम शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ और अपराजेय योद्धा थे, जिन्होंने भय और आतंक का नाश कर प्रेम, सौहार्द, शांति और निर्भयत्व की स्थापना की इसीलिए आज भी उनके महान् यश का सारे संसार में गुणगान किया जाता है।

त्रैता युग के उस चुनौती पूर्ण भीषण दौर में जब राजाओं के आतंक से ऋषि मुनि, गौ एवं एवं ब्राह्मण व्यथित थे और वह व्यथा उस वक्त अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई थी, जब ऐसे ही दुष्ट राजाओं में से एक सहस्त्रार्जुन ने परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि की हत्या कर दी। पौराणिक काल की उस विकराल, वीभत्स एवं हृदयविदारक घटना ने पृथ्वी से अत्याचारियों के समूल नाश की शुरुआत कर दी और सहस्त्रबाहु अर्जुन के वध से शुरू हुआ दमनकारी राजाओं के वध का सिलसिला तब रुका जब उनका सर्वनाश हो गया। भगवान् परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय राजाओं से रहित कर संपूर्ण रुप से पृथ्वी का भार उतार दिया। आरंभ में इन राजाओं ने उनके क्रोधावेग को केवल एक ब्राह्मण वेशधारी साधु का प्रलाप मानकर नजरअंदाज कर दिया था, किंतु जब क्षत्रियों पर उनका भीषण कुठार चला तो अंततः वे समूल नाश को प्राप्त हो गए।

श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार परशुराम की गणना दशावतारों में होती है। वे वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि, अर्थात् अक्षय तृतीया को पुनर्वसु नक्षत्र में रात्रि के प्रथम प्रहर, प्रदोषकालीन महावेला में जमदग्नि ऋषि के पुत्र रूप में माता रेणुका के गर्भ से प्रादुर्भूत हुए थे। इस तरह हैहयवंश का अंत करने हेतु स्वयं भगवान् विष्णु ने परशुराम के रूप में अंशावतार ग्रहण कर दुष्ट राजाओं का नाश किया, और ऋषि मुनियों, गौ और ब्राह्मणों को अभयत्व प्रदान किया, वे भगवान् श्रीहरि के अत्यंत प्रिय भक्त के रूप में अग्रगण्य और अजर अमर कहे गए है। इनकी गणना सात चिरजीवियों मे होती है, और वे आज भी महेंद्र पर्वत पर निवास करते हैं।

“श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान् श्री शुकदेवजी महाराज कहते हैं, परीक्षित! जमदग्निनंदन भगवान् परशुराम किसी को किसी प्रकार का दंड नहीं देते हुए आज भी शान्त चित्त से महेंद्र पर्वत पर निवास करते हैं, जहां सिद्ध, गन्धर्व और चारण उनके चरित्र का गुणगान किया करते हैं। आगामी मन्वन्तर में वे सप्तऋषियों के मंडल में रहकर वेदों का विस्तार करेंगे।”

भगवान् परशुराम के अवतार का उद्देश्य जहां अन्याय और अत्याचार का समूल नाश था, वहीं दूसरी तरफ शार्ङ्गधनुष की रक्षा भी थी, जिसे त्रैता युग में भगवान् विष्णु के ही अवतार श्री राम को सौंपा जाना था। विश्वकर्मा द्वारा भगवान् विष्णु के लिए निर्मित यह शार्ङ्गधनुष भगवान विष्णु का अत्यंत शक्तिशाली दिव्यास्त्र माना जाता है, जो स्वयं अविनाशी होते हुए भी शत्रुओं के लिए कालरुप था। यही शार्ङ्गधनुष भगवान् परशुराम के समक्ष एक चुनौती के रूप में मौजूद था, जिसे मनुष्य रूप में पृथ्वी पर विचरण कर रहे परब्रह्म को सौंपा जाना था, इसी बात को लेकर वे ब्रह्म का अनुसंधान करने लगे और तब शिव धनुष भंग होने पर राजा जनक की सभा में भगवान् परशुराम का क्रोधावेश वस्तुत: उस परब्रह्म परमात्मा के अनुसंधान का ही एक प्रयास था, जिसके माध्यम से वे ब्रह्म का दर्शन कर शार्ङ्गधनुष रुपी धरोहर उन्हें लौटाना चाहते थे और जब उनके और श्रीराम के बीच हुए संवाद ने रहस्यात्मक दौर में प्रवेश किया तब उनका वह अनुसंधान पूर्णता की और जा चुका था।

श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार भगवान् श्री राम परशुराम से बोले कि- “ब्राह्मण वंश की ऐसी ही प्रभुता (महिमा) है कि जो आपसे डरता है, वह सबसे निर्भय हो जाता है, अथवा जो भयरहित होता है, वह भी आपसे डरता है।” भगवान् श्रीराम के इस रहस्यमय वचन को सुनकर श्री परशुराम की बुद्धि के बंद द्वार खुल गए।

प्रभु के रहस्यमय वचन सुनकर और मनुष्य रूप में विचरण कर रहे अपने स्वामी के परमात्म स्वरूप का अनुभव कर परशुराम यद्यपि निश्चिन्त हो चुके थे, तथापि संशय के समूल नाश हेतु उन्होंने भगवान् श्री राम से ही निवेदन किया।

पुराण संहिताओं के अनुसार ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कोई भी महापुरुष शार्ङ्गधनुष पर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा सकता। श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं कि अपने मन में ऐसा विचार कर श्री परशुराम ने भगवान् श्रीराम को दिव्य शार्ङ्गधनुष देते हुए निवेदन किया कि- “है राम ! यह लक्ष्मीपति विष्णु का धनुष लीजिए और इसे खींचिये, अथवा यह कि इस पर प्रत्यंचा चढ़ाइए, जिससे मेरा सन्देह मिट जाए।”

ऐसा कहकर जब परशुराम प्रभु श्रीराम को धनुष देने को उद्यत हुए तब बड़ी ही विस्मयकारी घटना हुई कि वह धनुष स्वयमैव प्रभु के पास चला गया। भगवान् श्रीराम का ऐसा अद्भुत और अलौकिक प्रभाव जानकर श्री परशुराम हर्षातिरेक से भर उठे, और प्रेम गद्गद् हृदय से भगवान् श्रीराम का गुणगान करते हुए बारम्बार उनकी जय-जयकार करने लगे।

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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