अटल बिहारी वाजपेयीः लोकतांत्रिक नेतृत्व के आदर्श पुरुष
-गिरीश्वर मिश्र
स्वतंत्र भारत में यहाँ की विराट सांस्कृतिक परम्परा के संधान और उन्मेष की मानसिकता संजोने वाले जन-नायकों में भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी निश्चय ही अनूठे व्यक्तित्व हैं। वह बिना किसी पूर्वाग्रह के पक्ष हो या विपक्ष, वाम हो या दक्षिण, केद्र हो या परिधि सब प्रकार के लोगों के साथ संवाद करने के लिए प्रस्तुत रहते थे। लोकाभिमुख होने की यह वृत्ति प्रचारक के रूप में उनकी लम्बी देश-साधना के दौरान विकसित हुई थी। साथ ही संपादन कार्य उनको अद्यतन करता रहा। इस क्रम की ही परिणति थी कि भारतीय संस्कृति की साधना के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया।
आधुनिक मन वाले वाजपेयी जी ने आगे बढ़ कर देश की व्यापक कल्पना को संकल्प, प्रतिज्ञा और कर्म से जोड़ा और समर्पण के लिए आवाहन किया।
स्मरणीय है कि भारत पर अंग्रेजी औपनिवेशिक राज की लम्बी दासता से मुक्ति मिलने के बाद आज लोकतांत्रिक देशों की प्रथम पंक्ति में वैश्विक क्षितिज पर भारत आर्थिक और तकनीकी दृष्टि से एक सशक्त देश के रूप में प्रतिष्ठित हो रहा है। इस विरल उपलब्धि के पीछे राष्ट्रीय नेतृत्व और रीति-नीति की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने विभाजन के बाद की कठिन परिस्थितियों में साल 1947 में एक आधुनिक और समाजवादी रुझान के साथ उत्तर उपनिवेशी स्वतंत्र भारत की यात्रा शुरू की थी। इस यात्रा में जिस ढांचे को लेकर हम आगे बढ़े वह अपने बौद्धिक गठन में बहुत हद तक अंग्रेजों द्वारा अपने उपनिवेश के लोगों के लिए खड़ा किया था। शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी आदि के क्षेत्रों में नवाचार जरूर शुरू हुए और पंचवर्षीय विकास योजनाओं का दौर भी चला ताकि देश विकास की दौड़ में विकासशील देशों से पीछे न रह जाय।
पर असंतोष भी बढ़ा जिसके फलस्वरूप स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण की अगुआई में देश में व्याप्त विसंगतियों के खिलाफ संपूर्ण क्रांति का बिगुल बजा और भारत में सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तन की ऐतिहासिक शुरुआत हुई। भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और विभिन्न क्षेत्रों की उपेक्षा जैसे प्रश्नों से उलझते राजनीति का विकेंद्रीकरण शुरू हुआ। संभ्रांत के वर्चस्व की जगह व्यापक समुदाय जिसमें हाशिए पर स्थित मध्यम और दलित वर्ग भी शामिल था राजनीति में प्रतिभागी बन कर अपनी प्रभावी भूमिका के लिए अग्रसर हुआ। वाजपेयी जी ने देश के लिए व्यापक परिवर्तन की आकांक्षा को इन शब्दों में रेखांकित किया: आजादी अभी अधूरी है, सपने सच होने बाक़ी हैं, रावी की शपथ अधूरी है।
भारतीय राजनीति के नए दौर में पारदर्शिता, साझेदारी और संवाद की ख़ास भूमिका रही। लोकतंत्र के लिए आपातकाल बड़ा आघात था। उसके बाद कांग्रेस के विकल्प के रूप में ‘जनता दल’ का गठन हुआ और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में सरकार बनी। वाजपेयी ने इस सरकार में परराष्ट्र मंत्री का दायित्व संभला। आगे चलकर भारत का राजनैतिक परिदृश्य इस अर्थ में क्रमश: जटिल होता गया। यह स्पष्ट होने लगा कि विभिन्न राजनैतिक दलों को साथ लेकर चलने वाली एक समावेशी दृष्टि ही कारगर हो सकती थी। इसके लिए सहिष्णुता, खुलेपन की मानसिकता, सबको साथ ले चलने की क्षमता, सुनने-सुनाने का धैर्य और युगानुरूप सशक्त तथा दृढ़ संकल्प की आवश्यकता थी। इन सभी कसौटियों पर एक सर्वमान्य नेता के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी ही खरे उतरे। विविधता भरी राजनीति में उनको लेकर बनी सहमति का ही परिणाम था कि भारतीय संसद में उनको तीन बार देश के प्रधानमंत्री पद के लिए स्वीकार किया गया। यह अनूठी घटना थी। वर्ष 1999 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (नेशनल डेमोक्रेटिक अलाएंस या एनडीए) के कठिन नेतृत्व की कमान संभालते हुए वाजपेयी जी तीसरी बार प्रधान मंत्री बने। गठबंधन वाली यह पहली पूर्णकालिक सरकार थी।
एनडीए में दो दर्जन के करीब राजनैतिक दल साथ आये थे और 81 मंत्री थे। इन सबको साथ लेकर चलना कठिन चुनौती थी जिसे वाजपेयी जी ने स्वीकार किया था और उस अवधि में अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये। इनमें कुछ का उल्लेख प्रासंगिक होगा। उन्हीं की पहल पर भारत के चारों कोनों को सड़क से जोड़ने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना शुरू की गई जिसके तहत दिल्ली, कलकत्ता, चेन्नई और मुंबई को राजमार्गों से जोड़ा गया। संरचनात्मक ढाँचे के लिये कार्यदल, सॉफ्टवेयर विकास के लिये सूचना एवं प्रौद्योगिकी कार्यदल, विद्युतीकरण में गति लाने के लिये केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग आदि गठित किए गए। नई टेलीकॉम नीति आई। कोकण रेलवे की शुरुआत हुई। ये सब बुनियादी संरचनात्मक ढाँचे को मजबूत करने वाले कदम थे। उड़ीसा के सर्वाधिक निर्धन क्षेत्र के लिये सात सूत्रीय निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम आरम्भ किया। ग्रामीण रोजगार सृजन एवं विदेशों में बसे भारतीयों के लिये बीमा योजना शुरू की। पुराने कावेरी जल विवाद को सुलझाया। आवास निर्माण को प्रोत्साहन देने के लिए अर्बन सीलिंग एक्ट ख़त्म किया। वर्ष 2004 में कार्यकाल पूरा होने से पहले हुए आम चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन ने वाजपेयी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और भारत उदय (अंग्रेजी में इण्डिया शाइनिंग) का नारा दिया। इस चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। ऐसी स्थिति में वामपन्थी दलों के समर्थन से काँग्रेस ने भारत की केन्द्रीय सरकार पर कायम हुई। स्वास्थ्य कारणों से वाजपेयी जी ने सक्रिय राजनीति से विराम ले लिया।
निजी स्वार्थ से परे हट कर लोकहित की व्यापक चिंता वाजपेयी जी के लिए व्यापक जनाधार का निर्माण कर रही थी। लोकैषणा उनके व्यक्तित्व का वह केन्द्रीय पक्ष था जो जन-जीवन में किसी चुम्बक की तरह कार्य करता था। वे सबको सहज उपलब्ध रहते थे। अपने लक्ष्य के प्रति एकनिष्ठ समर्पण, सतत अध्यवसाय और सशक्त भारत देश के स्वप्न को साकार करने की असंदिग्ध और सघन चेष्टा ही थी जिसने वाजपेयी जी को पक्ष-विपक्ष का सर्वमान्य नेता बना दिया था।
भारतीय संसद के चार दशकों में विस्तृत अवधि में उनकी भूमिका के सभी क़ायल हुए। वे 1957 में पहली बार संसद पहुंचे थे और 2004 तक कुल दस बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा में सदस्य के रूप में जन प्रतिनिदित्व करते रहे। इतनी लंबी अवधि तक जनता का भरोसा जीतना बहुत कुछ बोलता है। वे निश्चित ही एक श्रेष्ठ और रचनात्मक दृष्टि से संपन्न सांसद थे। वे वाक् पटु थे और उनकी आरोह-अवरोह वाली द्रुत-विलंबित वाग्मिता सबको प्रभावित करती थी और श्रोता को अपने साथ बहा ले जाने वाली होती थी। वे अपना पक्ष प्रभावी पर सहज और तर्कपूर्ण ढंग से रखते थे और ऐसा करते हुए सांसदीय मर्यादाओं का यथोचित सम्मान करते थे।
बहुलता और विविधता वाले भारत में किसी भी तरह की वैचारिक एकरसता और जड़ता श्रेयस्कर नहीं है। कांग्रेसी सरकारों की उपलब्धियों और नाकामियों को लेकर बहसें चलती रहती हैं और आगे भी चलेंगी पर उस नज़रिए का सशक्त विकल्प तलाशना और उसे आकार देना ज़रूरी था और वैसा ही हुआ भी।
काल देवता की गति ऐसी हुई कि भारत की पहली पूर्णकालिक मुकम्मल ग़ैर-कांग्रेसी सरकार बनाने का श्रेय वाजपेयी जी को मिला। भारत के 13वें प्रधानमंत्री के रूप में देश के स्वाभिमान और गौरव के लिए वाजपेयी जी ने अनेक निर्णय लिए। पोखरन -2 का परमाणु परीक्षण एक गोपनीय और बड़े जोखिम से भरा निर्णय था। अनेक बड़े देशों ने इस कदम के चलते भारत पर कई किस्म की बंदिशें भी लगाईं परंतु वाजपेयी जी ने दृढ़तापूर्वक सभी चुनौतियों का सामना किया और देश के परमाणु कार्यक्रम को निर्विघ्न आगे बढ़ाया। वे पड़ोसी देशों के साथ सहयोग, संवाद और सौहार्द के महत्व को पहचानते थे और इसके लिए लगातार प्रयास करते रहे। देश में सड़कों का विस्तार कर आवागमन में सुविधा के लिए बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तृत संजाल के निर्माण की योजना आधार संरचनाओं के विस्तार लिए यह उपक्रम वरदान सिद्ध हुई । इसी तरह ‘सर्व शिक्षा अभियान’ द्वारा शिक्षा के सार्वभौमीकरण का बड़ा लक्ष्य हासिल करने की दिशा में देश आगे बढ़ा है। अनेक आर्थिक सुधारों को गति देते हुए इक्कीसवीं सदी के भारत को दिशा देने में वाजपेयी जी का योगदान अविस्मरणीय है।
वाजपेयी जी राजनेता के साथ सुकवि थे और उनके कई काव्य संग्रह भी प्रकाशित हुए थे। उनका स्पष्ट मत था कि भारत में अंग्रेजी जो एक विदेशी भाषा है, वह हावी है और उसका रोजगार पर असर है, जिसका एकजुट होकर गढ़ तोड़ना होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा में 1977 में भारत के परराष्ट्र मंत्री के रूप में वाजपेयी जी ने हिंदी में भाषण देकर एक नई पहल की ।
एक लेखक, कवि, पत्रकार और राष्ट्र-भक्त के रूप में भारतीय समाज और संस्कृति के लिए समर्पित विनय, संयम और धैर्य के धनी भारत माता के इस अनमोल सपूत ने अपनी दृढ़ इच्छा-शक्ति और कर्तव्य-निष्ठा से भारत माता की उल्लेखनीय सेवा की। वर्ष 2015 में उनको देश सेवा के लिए ‘भारत रत्न’ का सर्वोच्च सम्मान दिया गया था। भारत सरकार ने साल 2014 में उनका जन्मदिन ‘सुशासन दिवस’ के रूप में मनाने का निश्चय किया। आज आम जनता में राजनीतिज्ञों को लेकर अक्सर कपट, छल-छद्म और भ्रष्टाचार में लिप्त व्यक्ति की छवि बन रही है जिसके आचरण में पारदर्शिता का अभाव और स्वार्थ की अधिकता होती है। उन सबके विपरीत वाजपेयी जी सहज, स्पष्टवादी और विश्वसनीय आचरण की मिसाल हैं।
(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)