सीएजी ने डल झील में खुले पानी के क्षेत्र में 10% से अधिक कमी पर जताई चिंता

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जम्मू, 10 अप्रैल: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने डल झील के भूमि उपयोग और जल क्षेत्र में बड़े बदलावों की ओर ध्यान दिलाते हुए बताया कि 2007 से 2020 के बीच झील का कुल जल क्षेत्र 15.40 वर्ग किलोमीटर से घटकर 12.91 वर्ग किलोमीटर रह गया, यानी 10.15% की कमी आई है।

रिपोर्ट में कहा गया कि इस अवधि में खुले पानी के क्षेत्र में कमी आई, जबकि अन्य उपयोगों जैसे तैरते बगीचे 5.262 से बढ़कर 6.796 वर्ग किमी (6.23%), खेती और बागवानी क्षेत्र 2.29 से बढ़कर 2.85 वर्ग किमी (2.27%), तथा निर्मित क्षेत्र 0.743 से बढ़कर 1.025 वर्ग किमी (1.15%) तक बढ़ गए।

झील के पारिस्थितिक संतुलन पर बढ़ते दबाव की ओर इशारा करते हुए सीएजी ने कहा कि भूमि उपयोग में बदलाव के कारण जल क्षेत्र सिकुड़ रहा है और मानव गतिविधियाँ बढ़ रही हैं।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि झील संरक्षण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (LC&MA) द्वारा भूमि उपयोग को नियंत्रित करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए और न ही इन बदलावों के कारणों का उचित विश्लेषण किया गया।

सीएजी ने झील की बिगड़ती स्थिति के पीछे कई कारण बताए, जिनमें डल झील के किनारे अवैध कब्जे, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) का सही ढंग से काम न करना, प्रदूषण को रोकने में विफलता, खरपतवार की सफाई में कमी और कमजोर निगरानी शामिल हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, पोषक तत्वों के बढ़ते प्रवाह से झील में खरपतवार तेजी से फैल रहे हैं, जिससे खुले पानी का क्षेत्र और कम हो रहा है। मीर बेहरी, लाती मोहल्ला और नंदापोरा जैसे इलाकों में अतिक्रमण के कारण तैरते बगीचों और बस्तियों का विस्तार भी हुआ है।

सीएजी ने राष्ट्रीय झील संरक्षण कार्यक्रम (NLCP) और प्रधानमंत्री पुनर्निर्माण कार्यक्रम (PMRP) के तहत चल रही योजनाओं में भी गंभीर कमियाँ पाई हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना और उन्नयन, ठोस कचरा प्रबंधन, सीवर नेटवर्किंग, हाउसबोट और होटलों के पुनर्वास, जल निकासी प्रबंधन जैसे कार्य या तो अधूरे हैं या पर्याप्त रूप से लागू नहीं किए गए।

हालांकि STP पर 45 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए, फिर भी सीवेज निर्धारित मानकों के अनुसार शुद्ध नहीं हो रहा है, जिससे जल गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि घरों, हाउसबोट और होटलों से निकलने वाला बिना शुद्ध किया गया कचरा अब भी झील में जा रहा है, क्योंकि सीवर नेटवर्क अधूरा है और कई इकाइयाँ उपचार प्रणाली से जुड़ी नहीं हैं।

सीएजी ने 2017–22 के दौरान 48.63 करोड़ से लेकर 280.68 करोड़ रुपये तक के फंड के उपयोग में कमी (अंडरयूटिलाइजेशन) की ओर भी ध्यान दिलाया।

रिपोर्ट में देरी के कारणों में बोर्ड बैठकों का समय पर न होना, परियोजना प्रबंधन सलाहकारों की कमी और लंबित कार्यों के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार न करना शामिल बताया गया है।xx

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