घुमंतू समाज की पहचान का आधार बनेगी जनगणना

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डॉ. सत्यवान सौरभ

 

देश में कुछ समुदाय ऐसे भी हैं, जिन्हें आज तक ठीक से गिना ही नहीं गया—न आंकड़ों में, ना नीतियों में, और ना ही संवेदनाओं में। ये वे लोग हैं, जिन्हें कभी अंग्रेजों ने ”जन्मजात अपराधी” घोषित कर दिया था और आजादी के 78 साल बाद भी जिनकी पहचान उसी कलंक के बोझ तले दबी हुई है। यह विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियां हैं। यह आज भी भारत के विकास के नक्शे में अदृश्य बनी हुई हैं। ऐसे में 2027 की जनगणना केवल एक सांख्यिकीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि ऐतिहासिक न्याय का एक सुनहरा अवसर है। ब्रिटिश शासन के दौरान 1871 का आपराधिक जनजाति अधिनियम इन समुदायों के जीवन पर एक अमिट दाग बनकर चिपक गया। इस कानून ने उन्हें जन्म से ही अपराधी घोषित कर दिया, जिससे उनके जीवन का हर पहलू संदेह और निगरानी के घेरे में आ गया। यह केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं था, बल्कि सामाजिक बहिष्कार की एक संगठित व्यवस्था थी। स्वतंत्रता के बाद 1952 में इस अधिनियम को समाप्त कर इन समुदायों को “विमुक्त” तो कर दिया गया, लेकिन समाज की मानसिकता आज भी उस औपनिवेशिक सोच से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई। परिणामस्वरूप, ये समुदाय आज भी पुलिस के संदेह, सामाजिक तिरस्कार और सरकारी उपेक्षा का शिकार बने हुए हैं।

 

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन लोगों को आजादी के बाद मुख्यधारा में शामिल किया जाना चाहिए था, वे आज भी पहचान के संकट से जूझ रहे हैं। स्थायी निवास का अभाव, लगातार प्रवास और दस्तावेजों की कमी इनके जीवन की सबसे बड़ी बाधाएं हैं। आधार कार्ड, राशन कार्ड, वोटर आईडी जैसे सामान्य दस्तावेज, जो किसी भी नागरिक के अधिकारों का आधार होते हैं, इन समुदायों के लिए एक सपना बनकर रह जाते हैं। जब पहचान ही नहीं होगी, तो अधिकार कैसे मिलेंगे? यही कारण है कि ये समुदाय सरकारी योजनाओं, आरक्षण और कल्याणकारी कार्यक्रमों से लगातार बाहर रह जाते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में स्थिति और भी चिंताजनक है। घुमंतू जीवनशैली के कारण बच्चों की पढ़ाई लगातार बाधित होती है। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहने के कारण स्कूलों में नामांकन और निरंतरता दोनों ही मुश्किल हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, इन समुदायों में ड्रॉपआउट दर अत्यधिक है और साक्षरता का स्तर बेहद निम्न। शिक्षा से वंचित रहना केवल एक व्यक्तिगत नुकसान नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के भविष्य को अंधकार में धकेल देना है। स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। स्थायी स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच न होने के कारण ये लोग कुपोषण, संक्रमण और अन्य बीमारियों से जूझते रहते हैं। सरकारी अस्पतालों तक पहुंच की कमी और जागरूकता का अभाव उनकी समस्याओं को और गंभीर बना देता है।

 

इन सबके बीच सबसे ज्यादा कठिनाई महिलाओं को झेलनी पड़ती है। एक ओर वे सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन से जूझती हैं, तो दूसरी ओर लैंगिक भेदभाव और असुरक्षा की मार भी सहती हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रहने के कारण उनकी स्थिति और भी कमजोर हो जाती है। कई मामलों में वे राजनीतिक प्रतिनिधित्व से भी दूर रहती हैं, जिससे उनकी आवाज़ नीति-निर्माण तक पहुंच ही नहीं पाती। नीतिगत स्तर पर भी इन समुदायों के साथ लंबे समय तक न्याय नहीं हो पाया है। 2019 में विकास एवं कल्याण बोर्ड का गठन और सीड जैसी योजनाएं शुरू करना सकारात्मक कदम जरूर हैं, लेकिन उनका प्रभाव सीमित रहा है। बजट की कमी, कमजोर कार्यान्वयन और निगरानी तंत्र की अनुपस्थिति इन योजनाओं को प्रभावी बनने से रोकती है। सबसे महत्वपूर्ण समस्या यह है कि इन समुदायों के बारे में सटीक और विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। जब तक किसी समूह की वास्तविक संख्या, स्थिति और आवश्यकताओं का स्पष्ट आकलन नहीं होगा, तब तक उसके लिए प्रभावी नीतियां बनाना संभव नहीं है।

 

यही वह बिंदु है, जहां 2027 की जनगणना एक निर्णायक भूमिका निभा सकती है। अगर इस जनगणना में विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियों के लिए अलग कॉलम और कोड शामिल किया जाता है, तो यह उनके अस्तित्व को औपचारिक मान्यता देने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह पहचान, सम्मान और अधिकारों की बहाली का प्रश्न है। हालांकि, इस दिशा में कई चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। जाति जनगणना को लेकर पहले से ही राजनीतिक बहस जारी है और ऐसे में एक नई श्रेणी जोड़ना विवाद को और बढ़ा सकता है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि यह मुद्दा केवल राजनीति का नहीं, बल्कि मानवाधिकार और सामाजिक न्याय का है। अगर सरकार और समाज इस दिशा में ईमानदारी से प्रयास करें, तो इन चुनौतियों को पार किया जा सकता है।

 

इसके लिए आवश्यक है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर एक समन्वित रणनीति तैयार करें। स्थानीय स्तर पर सर्वेक्षण और डेटा संग्रह की व्यवस्था को मजबूत किया जाए, ताकि घुमंतू समुदायों को सही तरीके से गिना जा सके। आधुनिक तकनीक—जैसे डिजिटल जनगणना और जीपीएस ट्रैकिंग—का उपयोग कर उनकी गतिशील जीवनशैली को ध्यान में रखते हुए डेटा एकत्र किया जा सकता है। साथ ही, गैर-सरकारी संगठनों और सामुदायिक समूहों को इस प्रक्रिया में शामिल करना भी महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि वे इन समुदायों के साथ सीधे जुड़े होते हैं और उनकी वास्तविक स्थिति को बेहतर समझते हैं।

 

शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में विशेष योजनाएं बनाकर इन समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ना होगा। मोबाइल स्कूल, अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र और कौशल विकास कार्यक्रम जैसे उपाय उनके जीवन में वास्तविक परिवर्तन ला सकते हैं। इसके अलावा, पुलिस और प्रशासनिक तंत्र में संवेदनशीलता लाना भी जरूरी है, ताकि इन समुदायों के प्रति मौजूद पूर्वाग्रहों को समाप्त किया जा सके। वैश्विक स्तर पर भी ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं, जहां घुमंतू और हाशिये पर मौजूद समुदायों के लिए विशेष नीतियां बनाकर उन्हें मुख्यधारा में शामिल किया गया है। यूरोप में रोमा समुदाय के लिए चलाए गए कार्यक्रम इस दिशा में एक सकारात्मक उदाहरण हैं। भारत भी इनसे सीख लेकर अपने संदर्भ में प्रभावी नीतियां विकसित कर सकता है।

 

अंततः, यह सवाल केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि उस न्याय का है, जो इन समुदायों से दशकों से छीन लिया गया है। 2027 की जनगणना इस अन्याय को समाप्त करने का एक ऐतिहासिक अवसर है। अगर इस अवसर को भी गंवा दिया गया, तो यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं होगी, बल्कि यह हमारे संविधान के उस वादे का भी उल्लंघन होगा, जो समानता और न्याय की बात करता है। अब समय आ गया है कि हम इन अदृश्य नागरिकों को दृश्य बनाएं, उन्हें गिनें, पहचान दें और उनके अधिकारों को सुनिश्चित करें, क्योंकि जब तक समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति को न्याय नहीं मिलेगा, तब तक विकास का कोई भी दावा अधूरा ही रहेगा।

 

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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