शोक सभाओं की भव्यता का दुर्भाग्यपूर्ण चलन

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– डॉ. प्रियंका सौरभ

 

किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके उत्सवों से नहीं बल्कि उसके शोक से होती है। समाज दुःख को किस तरह ग्रहण करता है, उसे किस गरिमा और संवेदनशीलता के साथ व्यक्त करता है- यही उसकी मानवीय परिपक्वता का पैमाना है। दुर्भाग्यवश, आज हमारा समाज इस कसौटी पर खरा उतरता हुआ नहीं दिखता। शोक सभाएं, जो कभी दुःख बांटने और शोकाकुल परिवार को संबल देने का सहज माध्यम थीं, अब धीरे-धीरे भव्यता, प्रदर्शन और सामाजिक प्रतिस्पर्धा का मंच बनती जा रही हैं।

 

आज देश के अनेक हिस्सों में प्रमुख अखबारों के पन्ने पलटते समय यह दृश्य सामान्य हो गया है कि एक ही व्यक्ति के लिए दस, बीस या पचास शोक संदेश एक ही दिन प्रकाशित हो रहे हैं। वे भी साधारण नहीं बल्कि रंगीन, बड़े फॉन्ट में, कई बार पूरे-पूरे पृष्ठों पर। शोक संदेश अब सूचना नहीं, बल्कि विज्ञापन का रूप ले चुके हैं।

 

कभी छह–सात पंक्तियों का श्वेत-श्याम शोक संदेश ही यह बताने के लिए पर्याप्त होता था कि अमुक व्यक्ति का निधन हो गया है और अमुक स्थान पर शोक सभा आयोजित है। रिश्तेदार और परिचित बिना किसी तामझाम के पहुंच जाते थे। उस समय शोक की अभिव्यक्ति में सादगी थी, मौन था और आत्मीयता थी।

 

समय के साथ यह सादगी कहीं खोती चली गई। आज शोक संदेश का आकार, उसका रंग, उसका स्थान और उसका खर्च- सब कुछ सामाजिक हैसियत का प्रतीक बन गया है।

 

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मृत्यु जैसे अंतिम सत्य को भी हमने स्टेटस सिंबल में बदल दिया है। अब यह देखा जाता है कि किस परिवार ने कितना बड़ा शोक संदेश दिया, किसने रंगीन दिया और किसका संदेश पहले पन्ने पर छपा।

 

शोक सभाओं का स्वरूप भी इसी प्रवृत्ति का प्रतिबिंब बन गया है। अब साधारण बैठक या घर के आंगन में बैठकर संवेदना प्रकट करने का चलन कम होता जा रहा है। उसकी जगह विशाल मंडप, सजे हुए पंडाल, सफेद पर्दे, कालीन और भव्य साज-सज्जा ने ले ली है। कई बार तो शोकसभा किसी बड़े बैंक्वेट हॉल या मैरिज गार्डन में आयोजित की जाती है, जहां का वातावरण शोक से अधिक किसी सामाजिक समारोह जैसा प्रतीत होता है।

 

मंच पर मृतक का बड़ा, सुसज्जित चित्र रखा जाता है, पुष्पमालाओं और सजावटी रोशनी के बीच। शोकाकुल परिवार के सदस्य भी पूरी तरह सज-संवरकर आते हैं। उनका पहनावा, उनकी देहभाषा और उनका व्यवहार किसी गहरे दुःख की अनुभूति नहीं कराता।

 

ऐसा नहीं है कि वे दुःखी नहीं हैं लेकिन शोक की वह स्वाभाविक सादगी, वह मौन पीड़ा, इस भव्यता में दब जाती है।

 

शोकसभा में उपस्थित लोगों की संख्या अब संवेदना का नहीं बल्कि प्रतिष्ठा का पैमाना बन चुकी है। कितने लोग आए, कितनी गाड़ियां आईं, कितने नेता पहुंचे, कितने अधिकारी आए- इन सबकी गिनती और चर्चा होती है। शोकसभा समाप्त होने के बाद भी यह मूल्यांकन चलता रहता है कि “अमुक व्यक्ति तो आया ही नहीं” या “फलां बड़े साहब भी पहुंचे थे।” मानो शोकसभा मृतक के प्रति श्रद्धांजलि न होकर सामाजिक शक्ति प्रदर्शन का अवसर हो।

 

यह प्रवृत्ति केवल तथाकथित उच्च वर्ग तक सीमित नहीं रही है। छोटे और मध्यमवर्गीय परिवार भी अब इस होड़ में शामिल होते जा रहे हैं। वे जानते हैं कि इस तरह का आयोजन उनकी आर्थिक क्षमता से बाहर है, फिर भी सामाजिक दबाव के कारण वे पीछे हट नहीं पाते। परिणामस्वरूप शोकसभा, जो मानसिक संबल देने का अवसर होनी चाहिए, आर्थिक बोझ में बदल जाती है। कई परिवार इस बोझ को उठाने में कठिनाई महसूस करते हैं, लेकिन “लोग क्या कहेंगे” के भय से मजबूरी में यह सब करते हैं।

 

इस भव्य आयोजन में खानपान की व्यवस्था भी एक महत्वपूर्ण तत्व बन गई है। चाय, कॉफी, मिनरल वाटर, नाश्ता और कई बार भोजन तक की व्यवस्था की जाती है। इन व्यवस्थाओं की गुणवत्ता और विविधता पर भी ध्यान दिया जाता है। यह दृश्य उस मूल भावना से बिल्कुल विपरीत है, जिसके तहत शोकसभा का आयोजन किया जाता है। शोकसभा का उद्देश्य लोगों को खिलाना नहीं बल्कि शोकाकुल परिवार के दुःख में सहभागी बनना है।

 

शोकसभाओं में शामिल होने वाला व्यक्ति भी कई बार असमंजस में पड़ जाता है। वातावरण देखकर यह महसूस ही नहीं होता कि वह किसी शोकसभा में आया है। नए-नए रिवाज गढ़ लिए गए हैं, जबकि पुराने, सरल और गरिमामय रिवाज धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं।

 

एक और चिंताजनक पहलू यह है कि पुण्य स्मृति और पुण्य तिथि जैसे अत्यंत निजी भाव भी अब सार्वजनिक प्रदर्शन का माध्यम बनते जा रहे हैं। किसी प्रियजन को याद करना व्यक्तिगत अनुभूति है। उसकी स्मृति मन में, परिवार के बीच और सादगी के साथ जीवित रहनी चाहिए। फिर यह आवश्यकता क्यों महसूस होती है कि बरस-दर-बरस अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर पूरे समाज को बताया जाए कि आप आज भी अपने प्रिय को याद करते हैं? क्या स्मरण का मूल्य उसके प्रचार में निहित है?

 

यह प्रश्न केवल परंपरा का नहीं, बल्कि संवेदनशीलता का भी है। जब निजी दुःख सार्वजनिक दिखावे में बदल जाता है, तो उसकी आत्मा खो जाती है। शोक, जो आत्ममंथन और विनम्रता का अवसर होना चाहिए, वह अहं और प्रदर्शन का साधन बन जाता है।

 

समय आ गया है कि समाज इस प्रवृत्ति पर गंभीरता से विचार करे। हमें यह समझना होगा कि मृत्यु किसी की सामाजिक हैसियत नहीं पूछती। वह सबको समान बना देती है। ऐसे में शोक की अभिव्यक्ति भी समान, सरल और गरिमामय होनी चाहिए। शोकसभा का उद्देश्य मृतक के प्रति श्रद्धांजलि देना और जीवितों को सांत्वना देना है, न कि समाज के सामने अपनी सामर्थ्य का प्रदर्शन करना।

 

मीडिया, सामाजिक नेतृत्व और स्वयं समाज को मिलकर इस दिशा में आत्मसंयम दिखाना होगा।

 

अखबारों को भी यह सोचना चाहिए कि शोक संदेशों को विज्ञापन के रूप में बढ़ावा देना कहीं इस प्रवृत्ति को और तो नहीं बढ़ा रहा। सामाजिक प्रतिष्ठा का मापदंड शोक संदेशों के आकार से नहीं बल्कि मानवीय संवेदना से तय होना चाहिए।

 

अंततः, शोक का सबसे सुंदर स्वरूप वही है जिसमें कम शब्द हों, कम दिखावा हो और अधिक संवेदना हो। मौन में कही गई बात, भव्य मंच से बोले गए भाषण से कहीं अधिक गहरी होती है।

 

शोक सभाएं अत्यंत सादगीपूर्ण होनी चाहिए। यही मृतकों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है और यही संवेदनशील समाज की पहचान भी।

 

(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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