यूएन क्यों नहीं चाहता जम्मू-कश्मीर की बदलती तस्वीर देखना ?

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

 

संयुक्त राष्ट्र के कुछ विशेषज्ञों द्वारा हाल ही में भारत पर लगाए गए मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर यूएन किस चश्मे से भारत को देखता है। कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुआ क्रूर आतंकवादी हमला, जिसमें 26 निर्दोष लोग मारे गए, किसी भी राष्ट्र के लिए सिर्फ सुरक्षा चुनौती नहीं माना जा सकता है, यह राष्ट्रीय अस्मिता पर सीधा प्रहार था। हमले की औपचारिक निंदा करने के बाद यूएन विशेषज्ञ जिस तेजी से भारत सरकार की प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई को कटघरे में खड़ा करने में लगे दिखते हैं, वह आज इस तथ्य को उजागर करता है कि युनाइटेड नेशन की नजरें जमीन पर घट रही वास्तविकताओं से अधिक एक पूर्वनिश्चित नैरेटिव पर टिकी हुई हैं।

 

सवाल यह है कि क्या किसी भी संप्रभु राष्ट्र को अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का अधिकार नहीं? क्या कोई देश आतंकी वारदात के बाद हाथ पर हाथ धरे बैठा रह सकता है? आतंकवाद कोई वैचारिक बहस का विषय नहीं है, यह एक हिंसक अपराध है, जिसका उद्देश्य समाज और शासन को अस्थिर करना होता है, इसलिए भारत द्वारा 2800 संदिग्धों को पूछताछ या कानूनी कार्रवाई के लिए हिरासत में लेना न तो असामान्य है और न ही अव्यवहारिक। पर यूएन ने इसे मनमानी गिरफ्तारी, यातना, भेदभाव और सामूहिक दंड का रूप देने में जरा भी संकोच नहीं किया है। यह वह अतिशयोक्ति है जो अक्सर राजनीतिक प्रेरणाओं से संचालित रिपोर्टों में दिखाई देती है। जबकि कश्मीर का सच इससे बिल्कुल उलट है।

 

कहना होगा कि 2019 के बाद घाटी जिस विकास पथ पर आगे बढ़ रही है, वह कई दशकों की ठहराव वाली नीतियों से बिल्कुल भिन्न है। पर्यटन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है, युवा उद्यमों और सरकारी योजनाओं के माध्यम से रोजगार पा रहे हैं। स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे परिवर्तन दिख रहे हैं जो कश्मीर को नई आर्थिक पहचान देते हैं। देश भर से निवेशक कश्मीर को संभावनाओं की भूमि के रूप में देखने लगे हैं। स्थानीय लोग पहली बार महसूस कर रहे हैं कि उनके पास वह अपार अवसर हैं जो कभी चुनिंदा हाथों तक सीमित रहते थे। इसके बावजूद भी देखिए; यूएन की आई इस हालिया रिपोर्टों में इन सकारात्मक परिवर्तनों का कहीं उल्लेख नहीं होता, मानो जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य में कश्मीर क्षेत्र केंद्र द्वारा दी जा रही प्रताड़ना, दमन और संघर्ष की कहानी ही हो!

 

यूएन विशेषज्ञों का लगाया गया ये आरोप भी समझ के परे है कि सरकार ने इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला किया, जबकि वास्तविकता यह है कि कश्मीर में इंटरनेट या संचार सेवाओं पर अस्थायी नियंत्रण सुरक्षा कारणों से किया जाता है, ताकि अफवाहें न फैलें, आतंकी नेटवर्क डिजिटल माध्यम से सक्रिय न हो सकें और किसी संवेदनशील परिस्थिति का दुरुपयोग न किया जा सके। अब सोचने वाली बात ये है कि क्या मानवाधिकार केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक सीमित हैं और नागरिकों की जान की सुरक्षा कोई अधिकार नहीं?

 

इसी तरह विशेषज्ञों ने घरों के विध्वंस को सामूहिक दंड बताया। यह तथ्य छिपा लिया गया कि इनमें से अधिकांश मामले अवैध कब्जों, अवैध निर्माणों और न्यायिक प्रक्रिया के तहत आने वाली कार्रवाई से संबंधित होते हैं। भारत में कोई भी राज्य बिना कानूनी आधार के किसी भवन को ध्वस्त नहीं करता। किंतु कश्मीर का मामला होने के कारण हर प्रशासनिक कार्रवाई को ‘उत्पीड़न’ की संज्ञा दे देना इस अंतरराष्ट्रीय संस्था को सबसे आसान नजर आता है।

 

आज यूएन ने जिस तरह मुसलमानों के खिलाफ हिंसा और भेदभाव का मुद्दा उठाया है, वह एक और अतिशयोक्ति का उदाहरण है। कोई ये न भूले कि भारत में 20 करोड़ से अधिक मुसलमान रहते हैं और वे राजनीति, न्यायपालिका, सेना, प्रशासन, कला और शिक्षा हर क्षेत्र में समान अधिकारों के साथ अग्रणी भूमिका निभाते हैं। यदि कहीं कोई स्थानीय अपराध या दंगा होता है तो उसे पूरे देश की सामुदायिक संरचना पर आरोप के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास गलत और विभाजनकारी है। भारत का संविधान हर नागरिक को समान अधिकार देता है और उसकी लोकतांत्रिक संस्थाएँ किसी भी भेदभाव को सहन नहीं करतीं।

 

यूएन विशेषज्ञों ने कश्मीरी छात्रों की निगरानी पर भी सवाल उठाया है। यह तथ्य नजरअंदाज किया गया कि कई बार आतंकी संगठन छात्रों की पहचान का उपयोग ढाल की तरह करते हुए यहां लगातार पाए जा रहे हैं। हाल ही में दिल्‍ली कार बम ब्‍लास्‍ट की घटना हम सभी के सामने है ही, ऐसे में स्‍व‍भाविक तौर पर संवेदनशील राज्यों में सुरक्षा एजेंसियों का यह दायित्व होता है कि वे संभावित खतरों पर नजर रखें। इसे भेदभाव कहना भारत की सुरक्षा जरूरतों को न समझने और उन्हें हल्के में लेने जैसा है। यह भी समझने की जरूरत है कि कश्मीर पर रिपोर्ट बनाते समय यूएन अक्सर उन्हीं स्रोतों पर निर्भर रहता है जिनका उद्देश्य भारत के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव मजबूत करना होता है। यह उन देशों या लॉबी के प्रभाव का परिणाम है जो भारत को हमेशा विवादों में घिरा हुआ दिखाना चाहते हैं, जबकि ये संस्थाएँ यह नहीं समझतीं कि भारत अब एक ऐसा देश है जो अपनी सुरक्षा नीतियाँ स्वतंत्र रूप से तय करने के साथ ही अपने लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर नागरिक अधिकारों और राष्ट्रीय हित में संतुलन भी स्थापित करता है।

 

कहना होगा कि आज का कश्मीर तेजी से बदल रहा है, यह अब नई उम्मीदों और आर्थिक पुनर्जागरण का प्रदेश बन रहा है। आतंकवाद की कमर टूट चुकी है, पर्यटन चरम पर है और युवा भविष्य की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। भारत सरकार की कोशिशें लगातार कश्मीर को मुख्यधारा से और मजबूती से जोड़ने का प्रयास करती दिखती हैं, किंतु दुर्भाग्य यह है कि यूएन इन सकारात्मक परिवर्तनों को देखने की बजाय वही पुरानी नकारात्मक छवि को बार-बार दोहराने का काम करता दिखा है।

 

वस्‍तुत: सुरक्षा कार्रवाई को मानवाधिकार उल्लंघन बताने वाले विशेषज्ञों को यह समझना चाहिए कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल भारत की नहीं पूरी दुनिया की साझा लड़ाई है और जो देश आतंकवाद का सामना करते हैं उन्हें यह अधिकार होना चाहिए कि वे अपने नागरिकों की रक्षा के लिए कठोर से कठोर कदम उठा सकें। भारत की कार्रवाइयों को कानूनन, संविधानन और अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के दायरे में रखते हुए समझना चाहिए न कि पूर्वाग्रहों की दृष्टि से इसे किसी के द्वारा लिया जाए। ऐसे में बेहतर होगा कि यूएन इस बदलती वास्तविकता को स्वीकार करे और भारत की संप्रभुता तथा उसकी सुरक्षा प्राथमिकताओं का सम्मान करते हुए निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाए। ध्‍यान रहे, किसी भी अपराधी को दंड मिलना न्याय है और न्याय ही मानवाधिकारों की पहली शर्त भी है।

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