भारतीय श्रमिकों का सशक्तिकरण: समावेशी श्रम संहिता सुधारों पर ट्रेड यूनियन दृष्टिकोण
‘विकसित भारत’ का सपना तभी सच हो सकता है जब देश के मेहनती कामगारों को पूर्ण सम्मान मिले और उनकी सुरक्षा मजबूत हो । कामगारों और उद्योगों के बीच एक मजबूत और भरोसेमंद रिश्ता ही देश की अर्थव्यवस्था को टिकाऊ बनाता है और उसे रफ्तार देता है।
लंबे समय से चली आ रही पुरानी व्यवस्थाओं की सीमाओं और विसंगतियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है । सरकारी आँकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि विनिर्माण क्षेत्र (Manufacturing Sector) में रोजगार का अनुपात ऐतिहासिक रूप से अपेक्षा से कहीं कम रहा है, जिसके कारण भारत की उत्पादन क्षमता और औद्योगिक विस्तार की वास्तविक संभावनाएँ पूरी तरह विकसित नहीं हो सकीं हैं। ऐसे परिप्रेक्ष्य में, पुराने श्रम कानूनों की जटिलताओं एवं भिन्न-भिन्न प्रावधानों को दूर करने के लिए व्यापक और संरचनात्मक सुधार समय की माँग बन चुके थे।
एक उत्तरदायी श्रमिक संगठन के रूप में हमारा मानना है कि नई श्रम संहिताएं श्रमिकों के हितों को मजबूत करने, अधिक अवसर प्रदान करने और सुरक्षित-सम्मानजनक कार्य वातावरण सुनिश्चित करने की दिशा में एक दूरदर्शी कदम है। भारतीय मज़दूर संघ (बी.एम.एस) त्रिपक्षीय (उद्योग, सरकार और श्रमिक) वार्तालाप के महत्व पर बल देता है, हमारा मानना है कि देश की उन्नति में श्रमिकों के साथ-साथ उद्योग (Industry) भी एक वृहद हितधारक (stakeholders) तथा महत्वपूर्ण घटक है। श्रम कानूनों पर त्रिपक्षीय वार्ता, 2015 से चली आ रही है । समस्त केंद्रीय श्रम संगठन इसका हिस्सा रहे हैं l बी.एम.एस की औद्योगिक परिवार की संकल्पना रही है और हम मानते हैं कि उद्योग और श्रमिक एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों के हित समाश्रित हैं l उद्योगों के संगठन भी इन वार्ताओं का हिस्सा रहे हैं और इन श्रम संहिताओं के क्रियान्वयन का प्रभाव उन पर भी समान रूप से होगा l
इन संहिताओं में अधिकांश प्रावधान श्रमिक हितैषी हैं । ये प्रावधान देश की उत्पादकता बढ़ाने, रोजगार सृजन में तेजी लाने और सामाजिक सुरक्षा का दायरा विस्तार करने में सहायक सिद्ध होंगे । अन्य ट्रेड यूनियनों द्वारा की जा रही हड़ताल और विरोध पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित है । हम सरकार के इस सुधारात्मक कदम और इन संहिताओं की सराहना करते हैं l
‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ के राष्ट्रीय संकल्प को साकार करने के लिए उद्योग, श्रमिक और सरकार, तीनों का सहयोग अत्यंत आवश्यक है। हमारा विश्वास है कि इनका प्रभाव भारत की आर्थिक प्रगति, औद्योगिक विकास और श्रमिक कल्याण के लिए अत्यंत लाभकारी एवं सकारात्मक सिद्ध होगा।
सरकार ने 29 पुराने केंद्रीय श्रम कानूनों को मिलाकर चार नई और सरल संहिताओं (Codes) में बदल दिया है – 1) वेतन संहिता (2019)
2) सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020)
3) व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता (2020)
4) औद्योगिक संबंध संहिता (2020) ।
यह भारतीय इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा श्रम सुधार है। यह ऐतिहासिक कदम अंग्रेजों के जमाने के पुराने कानूनों को छोड़कर, आज के दौर के आधुनिक कानूनों को अपनाने का एक गौरवशाली पल है । भारत सरकार का इन सुधारों को लागू करना एक बहुत ही सराहनीय और प्रशंसनीय निर्णय है, जिसके लिए पूरा देश नेतृत्व का धन्यवाद करता है । अब जब ये कानून पूरे देश में लागू हो चुके हैं, तो यह मजदूरों और कामगारों के लिए एक सुनहरे दौर की शुरुआत है ।
इन संहिताओं के लागू होने से यह पक्का होगा कि हर श्रमिक को सुरक्षा, सम्मान और न्याय सरलता से प्राप्त होगा । इससे देश का विकास और मजबूत होगा । यह बदलाव ‘आत्मनिर्भर भारत’ की भावना को नई ताकत देता है और देश को अपने श्रमिकों की मेहनत के दम पर आगे बढ़ने का आत्मविश्वास भी देता है। दुनिया भर के उदाहरण यह बताते हैं कि जब मजदूरों के हित में अच्छे सुधार होते हैं, तो उससे उत्पादन बढ़ता है, निवेश आता है और सबका विकास होता है ।
आज जब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है, भारत उन्नति के एक विशिष्ट सुखद मोड़ पर खड़ा है । नई श्रम संहिताओं का लागू होना आज के बाजार की आवश्यकतानुसार उठाया गया एक उचित कदम है । यह विश्वास दिलाता है कि देश का आर्थिक विकास मजदूरों के अधिकारों और सुरक्षा के साथ तालमेल बनाकर आगे बढ़ेगा । ये सरल एवं साफ-सुथरे कानून निवेश को बढ़ाएंगे, रोजगार के बहुत सारे नए अवसर बनाएंगे और कामगारों के सम्मान को सबसे ऊपर रखेंगे ।
असंगठित से संगठित की ओर: समावेशी सुधारों के माध्यम से औपचारीकरण और सामाजिक न्याय
इन संहिताओं को जल्दी लागू करने का फैसला भारत की युवा आबादी और श्रम जगत की आवश्यकतानुसार है। हमारे देश में काम करने वाले लोगों का एक बहुत बड़ा हिस्सा राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देता है। चाहे वे निर्माण मजदूर हों, गिग श्रमिक हों या रेहड़ी-पटरी वाले हों या दूसरे राज्यों में काम करने वाले प्रवासी मजदूर, अब ये सभी कानूनी सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आ गए हैं । भारत का संविधान हर किसी को सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है, और ये नवीन कानून उस संवैधानिक सपने को सच करने का एक माध्यम हैं ।
इन संहिताओं की सोच दूरगामी है । ये सिर्फ बड़ी कंपनियों (संगठित क्षेत्र) तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हर एक मजदूर को अधिकार देते हैं। सही वेतन, समय पर भुगतान और सामाजिक सुरक्षा (जैसे पेंशन, बीमा) को एक ही नियम के तहत लाकर, ये संहिताएं यह सुनिश्चित करती हैं कि देश की उन्नति में मजदूरों को भी बराबर का हिस्सा मिले । जब हर मजदूर के सम्मान की रक्षा होगी, तभी देश की कमाई का फायदा सभी को सही तरीके से मिल पाएगा।
संहिताओं में निहित प्रमुख श्रमिक-केंद्रित प्रावधान
इन संहिताओं की असली ताकत इनके बदलाव लाने वाले नियमों में है, जो भारतीय श्रम कानूनों को विश्व भर के बेहतरीन मानकों के बराबर खड़ा करते हैं।
वेतन संहिता (2019)
यह संहिता आर्थिक स्वतंत्रता के अहम सवाल को हल करती है। यह ‘न्यूनतम वेतन’ (Minimum Wage) को सबका अधिकार बनाती है। यानी अब किसी भी क्षेत्र में काम करने वाले हर मजदूर को समय पर सुनिश्चित न्यूनतम वेतन जरूर मिलेगा। यह ‘फ्लोर वेज’ की बात करती है, जिसका मतलब है कि वेतन का एक ऐसा आधार तय होगा जिससे कम वेतन पूरे देश में कहीं नहीं दिया जा सकेगा, ताकि जीवन स्तर सम्मानजनक बना रहे। पहले का Factory Act 1948 वाला कानून केवल कुछ चुनिंदा नौकरियों (Scheduled Employments) पर लागू होता था, जिसके अंतर्गत लगभग 10 प्रतिशत मजदूर ही कवर होते थे । इसका परिणाम यह था कि ज्यादातर श्रमिक कानूनी रूप से न्यूनतम वेतन पाने के अधिकार से वंचित रह जाते थे । इसके अलावा, अतिविशिष्ट बात यह है कि यह ‘समान काम के लिए समान वेतन’ को जरूरी बनाती है, जो महिलाओं के लिए समान वेतन और सम्मान को सुनिश्चित करते हुए बराबरी का हक दिलाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। साथ ही, ओवरटाइम के लिए दोगुना मज़दूरी की गारंटी भी दी गई है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020)
यह संहिता सबको साथ लेकर चलने के मामले में एक बड़ी कामयाबी है। यह ‘गिग और प्लेटफ़ॉर्म वर्कर्स’ (जैसे ऑनलाइन डिलीवरी करने वाले या एप आधारित टैक्सी ड्राइवर) को पहली बार कानूनी तौर पर सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाती है। यह संहिता कंपनियों (एग्रीगेटर्स) से योगदान (अंशदान) लेने की व्यवस्था करती है, जिससे इन गिग वर्कर्स के लिए एक सामाजिक सुरक्षा फंड बन सकेगा। डिजिटल दुनिया में काम कर रहे युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने की यह एक समझदारी भरी पहल है। यह मानती है कि काम करने के तरीके बदल रहे हैं और यह निश्चित करती है कि तकनीक के सहारे काम करने वालों को बुनियादी सुरक्षा जरूर मिले। यह संहिता 40 करोड़ से अधिक श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा कवच की गारंटी सुनिश्चित करती है और असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए एक विशेष सामाजिक सुरक्षा कोष का निर्माण अनिवार्य करती है। यह कोष उनके स्वास्थ्य लाभ, पेंशन और आपातकालीन सहायता के लिए काम करेगा।
व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता (2020)
यह संहिता हर मजदूर के लिए काम करने की जगह को सुरक्षित और सेहतमंद बनाना सुनिश्चित करती है। विशेष रूप से, जोखिम वाले क्षेत्रों में 100% स्वास्थ्य सुरक्षा की गारंटी दी गई है। तय श्रेणियों के मजदूरों, खासकर 40 वर्ष से अधिक आयु के श्रमिकों के लिए, साल में एक बार मुफ्त स्वास्थ्य जांच (Annual Checkup Check-up) का अधिकार मिलेगा, जिससे कार्यस्थल पर सेहत का ध्यान रखने का एक नियम बन जाएगा। दूसरे राज्यों में जाकर काम करने वाले प्रवासी मजदूरों के लिए इसमें खास सुरक्षा है- जैसे घर जाने के लिए यात्रा भत्ता, और ‘एक देश, एक राशन कार्ड’ की तरह ही पोर्टेबिलिटी की सुविधा। इसका मतलब है कि प्रवासी मजदूर अब बेसहारा नहीं रहेंगे, बल्कि उन्हें ऐसे अधिकार मिलेंगे जो वे अपने साथ कहीं भी ले जा सकते हैं। लाभों की पोर्टेबिलिटी यह सुनिश्चित करती है कि मजदूर देश के किसी भी कोने में अपने अधिकारों का फायदा उठा सकें। साथ ही, यह सुनिश्चित करना कि महिलाएं पूरी सुरक्षा के साथ किसी भी उद्योग में, किसी भी शिफ्ट (पाली) में काम कर सकती हैं, उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का मार्ग खोलती है।
औद्योगिक संबंध संहिता (2020)
उद्योगों में कर्मचारियों को नियुक्ति पत्र (Appointment Letter) जारी करना नियोक्ताओं की एक जिम्मेदारी बन गयी है। इसके अलावा, ठेका श्रमिकों के लिए निश्चित अवधि के रोज़गार (Fixed Term Employment) की गारंटी और केवल 1 वर्ष की सेवा के बाद ग्रेच्युटी की गारंटी जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं। इसके साथ ही, यह शिकायतों को सुलझाने के लिए एक आसान तंत्र (system) बनाना जरूरी करती है, जिससे काम की जगह पर अच्छा माहौल बना रहे। नियमों को आसान बनाकर और शांति सुनिश्चित करके यह बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने में मददगार साबित होगी। इन सभी प्रावधानों के माध्यम से भारतीय कार्यबल के लिए अंतर-राष्ट्रीय-मानक सामाजिक न्याय की गारंटी दी गई है।
श्रमिक-केंद्रित विकास की ओर: एक स्वर्णिम भविष्य का आगाज़
इन चार श्रम संहिताओं के लागू होने से भारत ने एक मजबूत कानूनी और प्रशासनिक नींव रख दी है। इनके लागू होने से ‘व्यापार करने में आसानी’ (Ease of Doing Business) और ‘जीवन जीने में आसानी’ (Ease of Living), दोनों में बहुत सुधार आएगा । यह मजदूर और देश के बीच के रिश्तों को गहरा करेगा और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को ‘विकसित भारत’ की अर्थव्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ बनाएगा । इनके लागू होने के बाद जो सकारात्मक माहौल बनेगा, उससे साफ हो जाएगा कि भारत सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। कानूनी सुधार का पूरी तरह सफल होना मजदूरों के जीवन में खुशहाली और नया उत्साह भरेगा। संहिताओं का यह नया दौर हर भारतीय मजदूर के अधिकारों की गारंटी देता है और हमारे गणतंत्र के सामाजिक न्याय के वादों को पूरा करता है। इसी के साथ भारत ‘विश्व गुरु’ बनने की तरफ एक और मजबूत कदम बढ़ा चुका है।
भारतीय मजदूर संघ नवीन श्रम संहिताओं की सराहना करता है और सरकार से मांग करता है कि वह सभी हितधारकों से विचार-विमर्श करके प्रस्तावित लाभों का तीव्रता से आवण्टन करने की व्यवस्था करें, ताकि हर लाभार्थी को बिना विलंब किए अधिकार मिलना आरम्भ हो जाए।
(अखिलभारतीयसचिव, भारतीयमजदूरसंघ, बीएमएस)