भारत में कृषि शिक्षा और प्रशिक्षण: विकसित भारत की नई जड़ें

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लेखक: चंदर मोहन शर्मा

कृषि भारत की आत्मा है। यह न केवल देश की लगभग आधी आबादी को रोज़गार प्रदान करती है, बल्कि भारत के आर्थिक ढांचे का एक महत्वपूर्ण स्तंभ भी है। समय के साथ खेती का स्वरूप बदल रहा है—परंपरागत कृषि से आधुनिक, तकनीक-संचालित कृषि की ओर। इस बदलाव के केंद्र में हैं कृषि शिक्षा, अनुसंधान और प्रशिक्षण, जो किसानों और ग्रामीण युवाओं को न केवल नई तकनीक अपनाने में सक्षम बनाते हैं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर भी बनाते हैं।

कृषि शिक्षा का नया परिदृश्य

कृषि शिक्षा अब सिर्फ बीज बोने और फसल काटने तक सीमित नहीं रह गई है। यह एक व्यापक प्रणाली बन चुकी है, जिसमें वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक प्रौद्योगिकी, बाजार ज्ञान और पर्यावरणीय समझ को जोड़ दिया गया है।
देश में कृषि शिक्षा के विकास की अगुवाई भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) कर रहा है, जिसकी स्थापना 1929 में की गई थी। यह संस्था देशभर के 113 राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों और 74 कृषि विश्वविद्यालयों को जोड़ती है — जो इसे दुनिया का सबसे बड़ा कृषि अनुसंधान नेटवर्क बनाते हैं।

आईसीएआर ने शिक्षा और अनुसंधान के साथ-साथ “कृषि विस्तार” पर भी जोर दिया है, ताकि प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीक सीधे किसानों तक पहुंच सके। इसके लिए देशभर में 731 कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) स्थापित किए गए हैं, जहां लाखों किसानों को नई तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाता है।

कृषि विश्वविद्यालय: क्षेत्रीय ज़रूरतों के अनुरूप विकास

भारत में आज 63 राज्य कृषि विश्वविद्यालय, तीन केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय और चार मानद विश्वविद्यालय कार्यरत हैं। ये विश्वविद्यालय स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अध्ययन और अनुसंधान को आगे बढ़ाते हैं।

जैसे डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (बिहार), जो आठ कॉलेजों के माध्यम से कृषि, बागवानी, मत्स्य, सामुदायिक विज्ञान और कृषि व्यवसाय के क्षेत्र में शिक्षा दे रहा है। इसी तरह केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, इम्फाल (मणिपुर) पूर्वोत्तर के सात राज्यों की कृषि आवश्यकताओं को पूरा कर रहा है, जबकि रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी (उत्तर प्रदेश) बुंदेलखंड जैसे सूखाग्रस्त क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों से खेती में नवाचार ला रहा है।

इन विश्वविद्यालयों में स्नातक से लेकर पीएचडी तक के कोर्स चल रहे हैं। साथ ही, नई शिक्षा नीति के तहत अब अल्पकालिक प्रमाणपत्र और डिप्लोमा कार्यक्रम भी शुरू किए जा रहे हैं, ताकि युवा सीधे उद्योगों और कृषि-व्यवसाय से जुड़ सकें।

कृषि में डिजिटल क्रांति: एआई और आईओटी की भूमिका

आज का किसान सिर्फ खेत का मजदूर नहीं, बल्कि तकनीक से लैस एक प्रबंधक बन चुका है। सरकार कृषि में इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उपयोग को तेजी से बढ़ावा दे रही है।

ड्रोन से छिड़काव, सेंसर-आधारित सिंचाई, एआई-आधारित कीट पहचान, रिमोट सेंसिंग और डेटा विश्लेषण जैसी तकनीकें खेती को “स्मार्ट एग्रीकल्चर” में बदल रही हैं।
आईआईटी रोपड़, आईआईटी बॉम्बे और आईआईटी खड़गपुर जैसे संस्थानों ने कृषि में एआई और IoT के अनुप्रयोगों पर विशेष केंद्र स्थापित किए हैं। ये केंद्र फसल स्वास्थ्य पूर्वानुमान, जलवायु जोखिम विश्लेषण और उत्पादन बढ़ाने के लिए नई तकनीकें विकसित कर रहे हैं।

इसी तरह, इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय ने विशाखापत्तनम, गुरुग्राम और गांधीनगर में “सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन IoT” की स्थापना की है, जो कृषि स्टार्टअप्स और उद्योगों को जोड़कर नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं।

कौशल और प्रशिक्षण: किसान से उद्यमी तक

किसान अब सिर्फ उत्पादक नहीं, बल्कि उद्यमी भी है। यही कारण है कि सरकार किसानों और ग्रामीण युवाओं के कौशल विकास पर विशेष ध्यान दे रही है।
कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) हर साल लाखों किसानों को प्रशिक्षण दे रहे हैं। वर्ष 2021-22 से 2023-24 के बीच इन केंद्रों ने लगभग 58 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया, और यह संख्या लगातार बढ़ रही है।

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इसी तरह कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (एटीएमए) योजना ने 2021 से 2025 के बीच 1.27 करोड़ किसानों को प्रशिक्षण प्रदान किया है। यह योजना विकेंद्रीकृत कृषि विस्तार को मजबूत करती है और किसानों को स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए तैयार करती है।

ग्रामीण युवाओं का कौशल प्रशिक्षण (एसटीआरवाई) कार्यक्रम ने 2021 से अब तक 50,000 से अधिक युवाओं को बागवानी, डेयरी, मत्स्य पालन और कृषि मशीनरी जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया है। इससे ग्रामीण इलाकों में स्वरोजगार और उद्यमिता को बल मिला है।

इसके अलावा कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन (एसएमएएम) के तहत 57,000 से अधिक किसानों को कृषि मशीनों के कुशल उपयोग का प्रशिक्षण दिया गया है।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना ने 25 करोड़ से अधिक किसानों को संतुलित उर्वरक प्रयोग की जानकारी देकर मिट्टी की उत्पादकता बढ़ाने में मदद की है।

स्टार्टअप और एफपीओ: ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़

कृषि अब नवाचार और स्टार्टअप का नया केंद्र बन रही है। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) के तहत शुरू किया गया “नवाचार और कृषि उद्यमिता विकास कार्यक्रम” नए कृषि स्टार्टअप को वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है। ये स्टार्टअप खाद्य प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, डिजिटल कृषि और ब्लॉकचेन प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं।

साथ ही, सरकार ने 10,000 से अधिक किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) स्थापित किए हैं। ये संगठन छोटे किसानों को एकजुट कर बाजार तक सीधी पहुंच प्रदान कर रहे हैं और उन्हें कृषि-व्यवसाय में दक्ष बना रहे हैं।

साझा लक्ष्य: आत्मनिर्भर किसान, समृद्ध भारत

भारत की कृषि शिक्षा और प्रशिक्षण प्रणाली अब एक समन्वित ढांचा बन चुकी है—जहां शिक्षा, अनुसंधान, तकनीक और प्रशिक्षण चारों एक साथ चलते हैं।
आईसीएआर, कृषि विश्वविद्यालयों, केवीके और एटीएमए जैसी संस्थाओं ने एक “एक राष्ट्र – एक कृषि – एक टीम” की भावना के तहत मिलकर किसानों को सशक्त बनाने का बीड़ा उठाया है।

इंटरनेट ऑफ थिंग्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डेटा-आधारित निर्णय लेने जैसी तकनीकें भारतीय खेती को अधिक उत्पादक, टिकाऊ और आधुनिक बना रही हैं। दूसरी ओर, प्रशिक्षण और कौशल विकास कार्यक्रम ग्रामीण युवाओं को आत्मनिर्भर बना रहे हैं।

कृषि शिक्षा में हो रहा यह परिवर्तन न केवल फसल उपज बढ़ा रहा है, बल्कि एक “विकसित भारत” के सपने को साकार करने की दिशा में ठोस कदम साबित हो रहा है। जब किसान शिक्षित, प्रशिक्षित और तकनीक-सक्षम होगा, तभी भारत सच में “विकसित कृषि, समृद्ध किसान” के लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगा।

 

 

image.png(संकलित: “भारत में कृषि शिक्षा एवं प्रशिक्षण” – स्पष्टीकरण, पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी), जम्मू)

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