केंद्र को 4 हफ्तों में देना होगा जवाब जम्मू-कश्मीर पर फिर गूंजा राज्य का दर्जा मुद्दा, सर्वोच्च न्यायालय ने मांगी केंद्र से रिपोर्ट
आशु कुमार
नई दिल्ली, अक्तूबर 10:
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार को चार हफ्तों के भीतर जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने से संबंधित याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी।
यह याचिकाएं शिक्षाविद् जाहूर अहमद भट और सामाजिक कार्यकर्ता अहमद मलिक सहित कई लोगों ने दायर की हैं। इनमें केंद्र सरकार से अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के दौरान दिए गए आश्वासन के अनुरूप “यथाशीघ्र” राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में पिछले वर्ष शांतिपूर्ण ढंग से चुनाव कराए गए थे और एक निर्वाचित सरकार कार्यरत है, लेकिन हालिया पहलगाम आतंकी हमले जैसी घटनाओं के कारण सुरक्षा परिदृश्य की समीक्षा आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन के बीच परामर्श चल रहा है।
मेहता ने कहा, “पिछले छह वर्षों में क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, लेकिन कुछ हालिया घटनाओं पर विचार करना आवश्यक है। यह एक विशिष्ट और संवेदनशील मुद्दा है।”
मुख्य न्यायाधीश गवई ने भी सुरक्षा की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि पहलगाम की घटना ने क्षेत्र की चुनौतियों को फिर उजागर किया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन, जो जाहूर अहमद भट की ओर से पेश हुए, ने दलील दी कि केंद्र ने 2023 में राज्य का दर्जा बहाल करने का आश्वासन दिया था, “लेकिन तब से बहुत पानी बह चुका है।” इस पर मेहता ने प्रतिक्रिया दी, “और खून भी बहा है।” अदालत कक्ष में यह तीखी बहस कुछ देर तक जारी रही।
वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने विधायक इर्फान हाफिज़ लोन की ओर से दलील दी कि राज्य का दर्जा बहाल न करना भारतीय संघीय ढांचे (Federal Structure) के लिए खतरा है। उन्होंने कहा, “अगर एक राज्य को यूं ही केंद्र शासित प्रदेश में बदला जा सकता है, तो यह संघवाद की भावना के खिलाफ है। यह भविष्य के लिए खतरनाक उदाहरण होगा।”
एक अन्य अधिवक्ता ने कहा कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने एक वर्ष पहले राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन केंद्र ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
जम्मू के कुछ वकीलों की ओर से कहा गया कि क्षेत्र में रोजगार संकट और विकास परियोजनाओं की सुस्ती बनी हुई है। “शांति कायम है, यात्रा और पर्यटन भी बढ़ा है, फिर भी सुरक्षा का हवाला देकर राज्य का दर्जा टालना उचित नहीं है,” उन्होंने कहा।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा, “जम्मू-कश्मीर में उल्लेखनीय विकास हुआ है, लोग खुश हैं और अधिकांश नागरिक केंद्र सरकार को अपनी सरकार मानते हैं।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र को चार हफ्तों में जवाब दाखिल करना होगा और अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की गई है।