अधिक मास: आध्यात्म-विज्ञान का समन्वय और समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संदेश
-रमेश शर्मा
इस वर्ष ज्येष्ठ शुक्लपक्ष एकम, 17 मई से अधिकमास आरंभ हो गया है, जो सोमवती अमावस्या 15 जून तक रहेगा। अधिकमास को “पुरुषोत्तम मास” माना गया है। पंचांग के अनुसार अधिकमास का यह विधान विज्ञान, आध्यात्म और सामाजिक मनोविज्ञान के निष्कर्षों पर आधारित है। विज्ञान की दृष्टि से अधिकमास का निर्धारण सूर्य और चंद्रमा की गति के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए किया गया है, तो आध्यात्मिक दृष्टि से यह आत्मशक्ति जागृत करने का समय माना गया है। वहीं इसमें व्रत, पूजा और उपासना के जो विधान हैं, वे समाज में सकारात्मक चिंतन को प्रभावी बनाने के अद्भुत सूत्र भी हैं।
जीवन के लिए विज्ञान और आध्यात्म एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों के संयुक्त निष्कर्ष से जीवन समृद्ध और सकारात्मक बनता है। भारतीय परंपरा के विकासक्रम में धार्मिक उत्सवों का आयोजन हो अथवा तीज-त्योहारों का निर्धारण, यह केवल परंपरा निभाने या उत्सव मनाने के प्रावधान भर नहीं हैं। इनमें विज्ञान और आध्यात्म के समन्वय से जीवन को उन्नत बनाने के सूत्र निहित हैं, ताकि समाज उन्नतिशील बने और परस्पर व्यवहारिक समन्वय भी सशक्त हो। यही सिद्धांत अधिकमास के निर्धारण में भी निहित है।
अधिकमास का निर्धारण केवल धार्मिक या ज्योतिषीय आधार पर नहीं है, बल्कि इसका आधार सूर्य और चंद्रमा की गति में संतुलन स्थापित करना है। चंद्रमा की तुलना में सूर्य की गति तेज मानी जाती है। गति के इस अंतर के कारण वर्ष के अंत में समय का अंतर उत्पन्न हो जाता है। अधिकमास के निर्धारण से इस अंतर को समायोजित किया जाता है। यह आश्चर्यजनक है कि हजारों वर्ष पहले भारतीय मनीषियों को इस अंतर की सटीक जानकारी थी। इसी आधार पर पंचांग का निर्माण हुआ।
भारतीय पंचांग में वर्ष की अवधि का निर्धारण सूर्य की गति से होता है, जबकि प्रतिदिन पड़ने वाली तिथियों का निर्धारण चंद्रमा की गति से किया जाता है। यदि दोनों की गति की गणना की जाए, तो चंद्रमा की गति के अनुसार वर्ष की अवधि 354 दिन, 8 घंटे और 34.28 सेकंड होती है, जबकि सूर्य की गति के अनुसार वर्ष की अवधि 365 दिन, 6 घंटे और 9.54 सेकंड होती है। इस प्रकार दोनों के बीच लगभग 10 दिन, 21 घंटे और 35.16 सेकंड का अंतर हो जाता है। इस अंतर की गणना कर यह सुनिश्चित किया गया कि जब यह अंतर 29 दिन, 12 घंटे, 44 मिनट और 2.865 सेकंड से अधिक हो जाए, तब अधिकमास का प्रावधान कर इस समयावधि का संतुलन स्थापित किया जाए। सामान्यतः 19 वर्षों में सात अतिरिक्त मास जोड़े जाते हैं।
अधिकमास का निर्धारण कब किया जाए, इसका भी विधान सुनिश्चित किया गया है। सूर्य प्रत्येक राशि में लगभग एक माह तक रहते हैं। सूर्य के राशि परिवर्तन के आधार पर अधिकमास का निर्धारण किया जाता है। इस वर्ष 15 मई को सूर्य ने मेष राशि से वृष राशि में प्रवेश किया, लेकिन अमावस्या 16 मई को होने के कारण ज्येष्ठ शुक्लपक्ष एकम, 17 मई से अधिकमास आरंभ हुआ, जो 15 जून की अमावस्या तक रहेगा।
जब पृथ्वी के मौसम परिवर्तन का अध्ययन करते हुए सूर्य और चंद्रमा की गति के अंतर का पता चला, तब वर्ष की अवधि में सामंजस्य स्थापित करने के लिए अधिकमास का निर्धारण किया गया। इसके बाद प्रश्न उठा कि इस मास का नाम क्या हो और इसका स्वामी कौन माना जाए। इसके नामकरण की कथा श्रीमद्भागवत में भी वर्णित है।
चूँकि राशियाँ बारह होती हैं और सूर्य की यात्रा का निर्धारण इन्हीं राशियों के अनुसार होता है, इसलिए इस अतिरिक्त मास के लिए कोई राशि नहीं थी। इसी कारण इसे “मलमास” कहा जाने लगा। धीरे-धीरे यह धारणा भी बन गई कि यह अवधि अशुभ होती है। इससे दुःखी होकर अधिकमास समुद्र के पास पहुँचा और अपनी वेदना व्यक्त की। तब समुद्र उसे लेकर भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने इस मास को अपना नाम देकर “पुरुषोत्तम मास” घोषित किया और कहा कि इस मास में किए गए सभी आध्यात्मिक कार्यों का फल अधिक प्राप्त होगा। यह प्रसंग श्रीमद्भागवत में वर्णित है।
पुरुषोत्तम मास का उल्लेख श्रीमद्भगवद्गीता में भी मिलता है। तभी से अधिकमास “पुरुषोत्तम मास” कहलाया और इसके स्वामी श्रीमन्नारायण माने गए, इसीलिए इस मास में किए जाने वाले पूजन, भजन और साधना से भगवान नारायण प्रसन्न होते हैं तथा पुण्य का लाभ अधिक प्राप्त होता है। यदि इसे मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें, तो सकारात्मक कार्य करने से मन की अशांति दूर होती है और सकारात्मक कार्यों की गति बढ़ती है। स्वाभाविक रूप से इसके परिणाम भी अच्छे होते हैं। इसके अतिरिक्त सामूहिक अनुष्ठानों से परिवार और समाज के बीच समन्वय भी सुदृढ़ होता है।
अधिकमास का निर्धारण जहाँ विज्ञान के अनुसार सूर्य और चंद्रमा की गति के अंतर को समायोजित करने के लिए किया गया है, वहीं इसकी पूजा-उपासना पद्धति को आध्यात्मिक जागरण और सामाजिक सहभागिता से भी जोड़ा गया है।
व्यक्ति के अस्तित्व में पाँच आयाम माने गए हैं-
पहला अन्नमय कोष अर्थात शरीर,
दूसरा प्राणमय कोष अर्थात प्राणशक्ति,
तीसरा मनोमय कोष अर्थात मन,
चौथा विज्ञानमय कोष अर्थात बुद्धि,
और पाँचवाँ आनंदमय या आत्ममय कोष अर्थात आत्मा।
आत्मजागरण और आरोग्य के लिए इन पाँचों कोषों में ऊर्जा का संतुलन आवश्यक माना गया है। यदि किसी एक कोष में ऊर्जा अधिक हो जाए, तो दूसरे कोष की ऊर्जा कमजोर हो सकती है। आरोग्य की दृष्टि से यह असंतुलन रोगों का कारण बनता है, जबकि आत्मचेतना शरीर, मन और बुद्धि को सशक्त बनाने के साथ-साथ इन पाँचों कोषों में संतुलन भी स्थापित करती है।
अधिकमास में पूजन-विधि और भोजन के नियमों का निर्धारण इसी उद्देश्य से किया गया है कि इन पाँचों आयामों में ऊर्जा का संतुलन बना रहे और समाज के सभी वर्गों में समन्वय स्थापित हो। इसकी झलक अधिकमास के दौरान निर्धारित भोजन सामग्री और पूजन सामग्री में भी दिखाई देती है।
पुरुषोत्तम मास में गेहूँ, चावल, सफेद धान, मूँग, जौ, तिल, मटर, बथुआ, ककड़ी, केला, घी, कटहल, आम, पीपल, जीरा, सोंठ, इमली, सुपारी, आँवला और सेंधा नमक आदि के सेवन तथा पूरे माह एक समय भोजन करने का विधान बताया गया है। वहीं शहद, चौलाई, उड़द की दाल, राई, प्याज, लहसुन, गोभी, गाजर, मूली और तिल के तेल के सेवन से परहेज करने को कहा गया है।
इन भोजन नियमों तथा पूजन-विधियों को पाप-पुण्य की अवधारणा से जोड़ा गया है। भोजन, पूजन और दिनचर्या का विधान इस प्रकार किया गया है कि मनुष्य में सकारात्मक भाव उत्पन्न हों। आदर्श नागरिक और आदर्श समाज के निर्माण के लिए सकारात्मक चिंतन अत्यंत आवश्यक माना गया है। इस प्रकार अधिकमास का निर्धारण एक त्रिवेणी के समान है- इसमें विज्ञान का अनुसंधान है, आरोग्य एवं आध्यात्मिक जागरण है और सामाजिक सहभागिता का भाव भी समाहित है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं)