श्रम के सम्मान से पूरा होगा विकसित भारत का स्वप्न

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गिरीश्वर मिश्र

 

श्रम और उत्पादकता के मध्य अनिवार्य रिश्ते के चलते श्रम पर वर्चस्व स्थापित करने और अपने हित में करने की जद्दोजहद लम्बे समय से चलती चली आ रही है। दास, दस्यु, भृत्य, बेगार और मज़दूर के रूप में समाज के कुछ हिस्से पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंचित और उपेक्षित बने रहे। श्रमिक की स्थिति जाति की औक़ात से जुड़ गई। उनकी आर्थिक विपन्नता और निम्न सामाजिक स्थिति जगज़ाहिर है। उनका शोषण सदियों से होता चला आ रहा है। उनके साथ भेदभाव और पूर्वाग्रह का प्रमुख आधार अस्पृश्यता है जो सामाजिक दूरी को सुदृढ़ करती है।

 

समय के साथ इसके सामाजिक-राजनैतिक निहितार्थ जटिल होते गए हैं जिसका परिणाम आरक्षण नीति और उसे लागू करने में दिखते हैं। उनको निम्न स्तर के काम सौंप कर और फिर उस काम को ‘हीन’ कह कर उनसे दूरी बनाई गई। पीढ़ी-दर-पीढ़ी पीछे धकेले जाते रहने से जीवन शैली, विश्वास और परम्पराओं का भी भिन्न रूप बनता गया। एक ही समाज के अंग होने पर भी प्रभुत्व पर टिका सामाजिक स्तरीकरण ‘अन्नदाता’ (प्रभु) और ‘सेवक’ (आश्रित) की कोटियों को लेकर जाति-भेद की जड़ों को मज़बूत करता रहा। मानव अधिकार की पात्रता भी इसी से जुड़ गई। कर्म और कर्तव्य के नैसर्गिक आदर्श को भुलाते हुए श्रम का आशय बदलता रहा है। बहुतों की नज़र में काम न करना या कम काम करना या दूसरों (अधीनस्थ लोगों) द्वारा काम कराना इज्जत से जुड़ गया। ‘काम करना’ हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। काम करने वाले के ऊपर ज़ुल्म ढाना एक स्वीकृत रिवाज हो गया। समाज के अंतिम जन को लेकर “अस्पृश्य” और “अंत्यज” की कोटियाँ बना दी गई।

 

तथ्य यह भी है कि अन्यान्य कारणों से सामाजिक वर्ग भेद किसी न किसी रूप में हर समाज में मिलता है पर भारतीय परिस्थितियों में श्रम का सामाजिक ताना-बना ज़्यादा उलझता गया। सामाजिक सुधारों और क़ानूनी पहल से जातिगत भेदभाव से निजात पाने की कोशिश होती रही। इस बीच काम के तरीक़े और प्रकार भी बदले। कामकाज की दुनिया में प्रवेश को विशिष्टता, प्रशिक्षण और निपुणता की दृष्टि से अनेक श्रेणियों में रखने की शुरुआत हुई। आज सफ़ेदपोश और उच्च नौकरियों में बहुत थोड़े से लोग हैं दूसरी ओर असंगठित क्षेत्र में श्रमिकों का बाहुल्य है। अनुमान है कि आज भी बंधुआ मज़दूर जिनको काम के बदले पारिश्रमिक नहीं मिल रहा, बड़ी भारी संख्या में हैं। वे क़र्ज़ में हैं और इनमें महिलाएँ बड़ी संख्या में हैं।

 

आज भारत में अनुमानतः कुल श्रमिकों में से लगभग 93 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र से आते हैं। उनके लिए न्यूनतम वेतन की सुरक्षा दे पाना आज भी बड़ी चुनौती है। उदाहरणार्थ कृषि कर्मियों को भी समुचित पारिश्रमिक नहीं मिलता। ऐसे ही फ़ैक्ट्री या खदान के दमघोंटू ख़राब वातावरण में काम की अस्वास्थ्यकर दशाओं को सुधारना असंभव ही लगता है। सीवर में नीचे पैठ जाने कितने श्रमिक प्रतिवर्ष जान से हाथ धो बैठते हैं। बड़े पैमाने पर होने वाली घटनाएँ भी प्रभावित करती हैं। उदाहरणार्थ कोविड महामारी के दौरान लॉकडाउन हुआ। उसके चलते विस्थापन और नौकरी गँवाने की बड़ी घटनाएँ हुई। इनका सीधा असर गरीब जनता और दिहाड़ी मज़दूरों पर पड़ा।

 

यह याद रखना होगा कि श्रम उत्पादन की शक्ति है जो ऐसे कार्य को द्योतित करती है जो लोग वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन के लिए करते हैं। श्रम में सभी मानवीय गतिविधियाँ (शारीरिक और मानसिक प्रयास) सम्मिलित होती हैं जो किसी उत्पाद या सेवा को समृद्ध कर मूल्यवान बनाती हैं। श्रमिक या मज़दूर समाज के ऐसे विशिष्ट समूह कहे जा सकते हैं जो इसमें संलग्न होते हैं। इस सोच में श्रम भी विक्रय की वस्तु (कमोडिटी) हो गया और श्रम की ख़रीद-फ़रोख़्त हो रही है। श्रम या कार्य-बल (लेबर फ़ोर्स) उत्पादन का एक सक्रिय और अनिवार्य साधन है। श्रम काम का माप होता है और इसमें वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में किया जाने वाला सभी प्रकार का कार्य शामिल होता है।

 

श्रम उत्पादन में भूमि और पूँजी की तरह ही एक कारक है जो आर्थिक विकास को निर्धारित करता है। यह श्रम कितने शिक्षण और प्रशिक्षण की अपेक्षा करता है इसे ध्यान में रख कर बहुधा कुशल (जिसके लिए उच्च स्तर का प्रशिक्षण अपेक्षितहोता है ), अकुशल (प्रशिक्षणरहित ), अर्ध कुशल ( कुशल और अकुशल के बीच) और पेशेवर (उच्चतम शिक्षा और प्रशिक्षण अपेक्षित) इन चार श्रेणियों में विभाजित किया जाता है। श्रमिक को वेतन या किसी दूसरे क़िस्म का मुआवज़ा देकर उसकी श्रम सेवाएँ श्रम के बाज़ार से ख़रीदी जाती हैं। आज भारतीय जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा युवा है जो उत्पादकता का सक्षम माध्यम हो सकता है बशर्ते उसे सुशिक्षित और कौशलयुक्त बना कर प्रशिक्षण से निपुण की कोटि में लाया जाय।

 

विभिन्न प्रकार के उद्योगों और व्यवसायों का मूल आधार श्रम ही है। श्रमिक नौकरियों के लिए और नियोक्ता श्रमिकों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। श्रम-सेवाओं की माँग और आपूर्ति किसी भी समय काम की मात्रा, उपलब्ध श्रमिकों की संख्या, श्रमिकों द्वारा मज़दूरी का स्वीकार्य स्तर को देखते हुए घटती-बढ़ती है। श्रम के लिए अनेक क़ानून बनाए गए हैं जो न्यूनतम मज़दूरी और उनके हितों की रक्षा के लिए हैं। इसकी देखरेख के लिए श्रम मंत्रालय और उसके अधीन व्यवस्थाएँ बनी हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) वैश्विक स्तर पर श्रम से जुड़े नीतिगत प्रश्नों के समाधान के लिए उद्यत रहता है। व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति के लिए साल 2020 में क़ानून बना था जो श्रमिक, रोज़गार देने वालों और ट्रेड यूनियन के बीच का रिश्ता निर्धारित करता है। काम के घंटे, उपस्थिति, शर्तें, छुट्टी, अधिकार और देनदारी (बीमारी और दुर्घटना आदि) को ध्यान में रख सुरक्षा हेतु व्यवस्थाएँ दी गई हैं।

 

साल 2022 में जारी न्यूनतम वेतन अधिसूचना के अनुसार अर्धकुशल श्रमिक का वेतन 10,687 रुपये और कुशल श्रमिक का वेतन 11, 584 रुपये तय हुआ था। साल 2023 में दिहाड़ी मज़दूर का पारिश्रमिक 385 रूपये प्रतिदिन निश्चित हुआ था । निर्माण से जुड़े उद्योग श्रम-प्रधान होते हैं जिनमें हाथ और औंजारों का उपयोग मुख्य होता है। सेवा-उद्योग भी होते हैं जो मुख्यतः आतिथ्य और निजी देख-भाल से जुड़े होते हैं। भारत में अब श्रमिकों को न्यूनतम मज़दूरी का अधिकार मिल गया है। अनुमान है कि संगठित और असंगठित श्रमिक की जनसंख्या पचास करोड़ से ज़्यादा हैं। बाल श्रम और बंधुआ मज़दूरी का उन्मूलन अभी भी शेष है।

 

जीवन में तकनीकी की बढ़ती घुसपैठ के चलते मनुष्य के श्रम के स्वरूप में क्रांतिकारी बदलाव आ रहे हैं। जीवन के विभिन्न कार्यों के तरीक़े बदल रहे हैं। ज़्यादा दिन नहीं हुए कोरोना ने दृश्य ही बदल दिया था जब रिमोट वर्किंग का दौर शुरू हुआ और नए ढाँचे में काम धाम शुरू हुआ । आज बौद्धिक श्रम करने वाले ‘बुद्धिजीवी’ और शारीरिक श्रम करने वाले को ‘श्रमजीवी’ कहने का चलन है। दो कोटियाँ बना कर एक अस्तित्व के दोनों पक्षों की परस्परपूरकता को खंडित कर दिया गया। बुद्धिजीवी और श्रमजीवी कह कर मन और शरीर का जो द्वैत शुरू हुआ वह भ्रामक होते हुए व्यावहारिक रूप से लागू है। शारीरिक श्रम की स्थिति में जहां श्रम प्रत्यक्ष होता है उसका मूल्य कम आंका जाता है। दूसरी ओर मानसिक श्रम की क़ीमत की कोई सीमा ही नहीं है।

 

भारतीय संविधान की दृष्टि में सभी श्रमिक एक समान हैं और किसी के विरुद्ध लैंगिक और जातिगत भेदभाव नहीं होना चाहिए। रोज़गार के लिए समान अवसर सबका अधिकार है। जबरन श्रम कराना निषिद्ध है और बाल श्रम पर रोक लगाई गई है। काम करने का अधिकार सक्रिय है और राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम भी लागू है। अभी भी देश में लाखों लोग बेरोज़गार हैं और निम्न गुणवत्ता की नौकरियों में फँसे हुए हैं। देश के विकास को गति देने के लिए ज़रूरी है कि कार्यबल में शामिल होने के लिए नए प्रवेशकों को अवसर दिए जाय। श्रम का आदर और सम्मान देने की संस्कृति अपनाकर ही विकसित भारत का स्वप्न पूरा हो सकेगा।

 

(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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