दिल्ली की अनधिकृत कालोनियों को अधिकृत करने की एक और कोशिश

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-मनोज कुमार मिश्र

 

केंद्र सरकार और राज्य सरकार के साथ दिल्ली नगर निगम ने 1731 में से 1511 अनधिकृत कालोनी के करीब दस लाख परिवार को मालिकाना हक देने का फैसला किया है। दिल्ली की अधिकांश जमीन का मालिकाना हक दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के पास है। केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के साथ 21 अप्रैल को साझा संवाददाता सम्मेलन करके इसकी जानकारी दी।

 

इससे पहले 23 अक्तूबर, 2019 को तत्कालीन केन्द्रीय शहरी विकास राज्य मंत्री हरदीप सिंह पुरी केन्द्रीय मंत्रिमंडल के फैसले की जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि प्रधानमंत्री उदय योजना के तहत नाम मात्र का शुल्क लेकर कुछ अपवाद को छोड़ कर सरकारी और निजी जमीन पर बनी कालोनियों को निवासियों को मालिकाना हक देकर उसे नियमित किया जाएगा। उसी की अगली कड़ी में मनोहर लाल खट्टर और दिल्ली की मुख्यमंत्री ने यह घोषणा की। यह भी कहा कि जहां है, जैसा है -के आधार पर कालोनियां नियमित की जाएगी।

 

देशभर से रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में दिल्ली आने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। दिल्ली को विकसित करने की जिम्मेदारी लेने वाली डीडीए इस काम में कब की फेल हो चुकी है। डीडीए लोगों को रहने के लिए घर देना तो दूर अपनी जमीन की हिफाजत तक नहीं कर पाई। डीडीए की हजारों एकड़ जमीन पर भू-माफिया सरकारी कर्मचारियों और नेताओं के साथ मिलकर लगातार अनधिकृत कालोनी बसा रहे हैं। पहले तो नेता ऐसे लोगों को वोट और नोट के लिए संरक्षण देते थे, अब तो अनेक माफिया चुनाव जीत कर निगम पार्षद, विधायक और सांसद बनने लगे हैं। वोट की राजनीति में कोई भी दल किसी भी अनधिकृत कालोनी को तोड़ने की हिम्मत नहीं कर सकता है। आज तक इस तरह की कालोनी को बसाने वाले एक भी भू-माफिया पर कारवाई नहीं हुई है। यही हाल अवैध झुग्गियों का है।

 

यह नियम बन गया है कि किसी झुग्गी परिवार को बिना वैकल्पिक जगह दिए नहीं हटाया जाएगा। बावजूद इसके दिल्ली के मुख्य इलाकों से हटाकर दिल्ली की सीमा पर बसाने पर भी विवाद होता रहा है। पूर्व नौकरशाह और केन्द्र सरकार में मंत्री रहे जगमोहन को 2004 के लोकसभा चुनाव में झुग्गी हटाने को मुद्दा बना कर हरा दिया। खुद जगमोहन का कहना था कि उनके खिलाफ कांग्रेस के ही नहीं भाजपा का एक वर्ग सक्रिय था। जबकि वास्तव में झुग्गी बस्तियों को व्यवस्थित तरीके से नए स्थान पर बसाने और यमुना नदी में गंदगी जाने से रोकने का जैसा अभियान जगमोहन ने शुरु किया था, वैसा उसके बाद अभी तक दोबारा नहीं हो पाया।

 

करीब 365 गांव की जमीन पर 1483 वर्ग किलोमीटर की दिल्ली बसी है। 1911 में राजधानी बनने के बाद इसका आखिरी बार विस्तार 1911 में हुआ जब मेरठ जिले के यमुना पार के 65 गांव दिल्ली के इलाके में शामिल किए गए। पहली संपन्न दिल्ली आज की सिविल लाइंस और उत्तरी दिल्ली है जो पुरानी दिल्ली से लगा हुआ था। अंग्रेजों ने नई दिल्ली यानी लुटियन दिल्ली बनाई। देश के विभाजन के समय पाकिस्तान से आए विस्थापितों को आज के दक्षिणी दिल्ली और पश्चिमी दिल्ली के लाजपत नगर, राजेन्द्र नगर आदि कालोनियां में सरकार ने प्लाट देकर बसाया। उन्होंने अपने उद्यम से दक्षिणी दिल्ली को सबसे समृद्ध इलाका बना दिया। रोजगार आदि के लिए देश के दूसरे राज्यों से लोगों का आना हर रोज बढ़ता ही गया। भू-माफिया ने नेताओं, सरकारी कर्मचारियों और पुलिस से मिलीभगत करके गांवों की खाली जमीन पर अनधिकृत कालोनी और झुग्गियां बसाने का अभियान चलाया। उन्हें नोट मिले और नेताओं को नोट के साथ वोट भी मिले।

 

दिल्ली को विकसित करने के लिए 1957 में बनाया गया दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने अपनी भूमिका कभी पूरी नहीं की।उसके अधिकारी और कर्मचारी भ्रष्टाचार के खेल में अव्वल भूमिका निभाते आ रहे हैं। जरूरतमंदों को उचित कीमत पर घर देने के बजाए अपनी जमीन पर अवैध कालोनी बसाने में सहयोगी बने रहे। यह कैसे संभव है कि हजारों एकड़ जमीन पर कब्जा हो गया और डीडीए के अधिकारियों को इसका पता नहीं चला।

 

पहली बार कांग्रेस ने अपना वोट बैंक पक्का करने के लिए 1071 में 54 कालोनियां को नियमित किया। इसमें कांग्रेस नेता हरकिशन लाल भगत ने यमुना पार की लक्ष्मीनगर, शकरपुर आदि कालोनियों को नियमित करवाया। यही काम बाहरी दिल्ली में सज्जन कुमार ने कराए। झुग्गी वालों को जेजे कालोनी में मकान देने के अलावा य़मुना पार और बाहरी दिल्ली में मंगोलपुरी, सुल्तानपुरी, त्रिलोकपुरी, कोंडली, सीमापुरी, नंदनगरी, सीलमपुरी, गोकुलपुरी इत्यादि अनेक पुनर्वास कालोनी बसा दी। 1976-77 में आपातकाल में लोगों की नाराजगी दूर करने के लिए 514 रुपए प्रति वर्गमीटर विकास शुल्क देकर 607 कालोनियों के नियमित करने की घोषणा की गई। वास्तव में 567 कालोनियां ही नियमित हो पाई और वह भी बिना विकास शुल्क के।

 

कांग्रेस नेता चतर सिंह कहते हैं कि 1977 में तो इन कालोनियों के निवासियों ने जनता पार्टी को वोट किया लेकिन बाद में लंबे समय तक कांग्रेस के साथ रहे। इन्हीं नियमित और अनियमित अनधिक़ृत कालोनियों और पुनर्वास बस्तियों के निवासियों के बूते ही महानगर परिषद के आखिरी चुनाव में कांग्रेस जीती। उस चुनाव के बाद भाजपा नेता मदनलाल खुराना ने पहली बार इन बस्तियों में भाजपा के लिए राजनीतिक जमीन तैयार की। इसी बीच में दिल्ली को विधानसभा मिली और 1993 में विधानसभा का पहला चुनाव हुआ। चुनाव में भाजपा जीती और मदनलाल खुराना मुख्यमंत्री बने। अपने वायदे के हिसाब से एरियल सर्वे करवाकर 1071 कालोनियों को नियमित करने की विधानसभा में घोषणा की। एक तो केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी और दूसरे जैन हवाला कांड में नाम आने पर खुराना ने इस्तीफा दे दिया। फिर साहिब सिंह और आखिरी चार महीने सुषमा स्वराज मुख्यमंत्री रही। बिना कालोनी नियमित किए भाजपा सरकार की 1998 में विदाई हो गई।

 

दिसंबर 1998 में शीला दीक्षित की अगुवाई में कांग्रेस की दिल्ली में सरकार बन गई। इस बीच में कालोनियों की संख्या बढ़ गई। पहले भू-माफिया नेताओं को साथ लेकर अवैध कालोनी बसाते थे। अब तो कालोनी बसाने वालों में कई पैसे के बल पर विधानसभा पहुंच गए। एक समय ऐसा आया कि दिल्ली की कांग्रेस सरकार के शहरी विकास मंत्री डाक्टर अशोक कुमार वालिया को उनके ही दल के विधायकों ने विधानसभा में बयान नहीं देने दिया। उन्होंने सदन में बताया कि जिन 1071 कालोनी की सूची तैयार की गई है उनमें से 762 के ही ले आउट प्लान और फाइल उपलब्ध हो पाया है। बाद में यह संख्या 810 हो पाई यानी करीब ढाई सौ कालोनी का वजूद दी नहीं है। फर्जी तरीके से यह संख्या लगातार बढ़ाई जाती रही। यह बढ़कर 1639 हो गई।

 

2008 के चुनाव से पहले दिल्ली की कांग्रेस सरकार ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से आधे से अधिक बसावट वाली 1218 कालोनी को नियमित करने का अस्थाई प्रमाण पत्र दिलवाए। बाद में कालोनी की संख्या पर हंगामा हो गया। एक-एक कालोनी का सर्वे किया गया तो पता चला कि 43 कालोनी का वजूद ही नहीं है और 137 कालोनी में बसावट दस फीसदी से कम है। 1018 कालोनी विवाद रहित है। 2013 के विधानसभा चुनाव से पहले 895 को नियमित करने की घोषणा की गई। इसके लिए निजी जमीन पर बनी कालोनी के लिए दो सौ रुपए प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से और सरकारी जमीन पर बनी कालोनी के लिए 575 रुपए विकास शुल्क लेना तय किया गया। लेकिन कालोनी नियमित नहीं हो पाई।

 

अगली सरकार आम आदमी पार्टी (आप) की बनी। पहली सरकार 49 दिन चली। फिर दिल्ली में पहली बार राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। 2015 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत से आआपा की सरकार बनी। इन कालोनियों और पुनर्वास बस्तियों में एकतरफा वोट आआपा को दिया। केजरीवाल सरकार ने इन कालोनियों में रजिस्ट्री शुरु करवाने का फैसला किया लेकिन वह भी कोरा वायदा ही रहा। लेकिन इनके निवासियों पर मुफ्त की रेवड़ियां (फ्री बिजली-पानी आदि) ही उनके लिए कारगर रही। उसके बाद हर चुनाव में इन कालोनी को नियमित करने का मुद्दा उठता रहा। केन्द्र में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार आने पर यह मुद्दा फिर से उठने लगा। 2019 में केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने पीएम उदय योजना के तहत इन कालोनी को नियमित करने का फैसला लिया। अब उस पर अमल हो रहा है।

 

शहरी योजना के जानकार और नगर निगम की निर्माण समिति के अध्यक्ष रहे जगदीश ममगांई सरकार की ताजा घोषणा को छलावा से ज्यादा कुछ मामने को तैयार नहीं हैं। 2019 में तो इन कालोनियों को नियमित करने की बात कही जाती थी अब तो केवल मालिकाना हक देने की बात कही जा रही है। ज्यादातर कालोनी ग्राम सभा की खेती की जमीन पर बनी है। जमीन खरीद कर घर बनाने वाले पहले ही मालिक हैं। अगर मालिकाना हक दिलाना है तो सरकारी जमीन, वन विभाग की जमीन और रेलवे की जमीन पर बनी कालोनी के दिलवाए। सभी जमीन का मालिकाना हक पहले सरकार के पास हो फिर उसे नियमित करने के लिए अगला कदम उठाया। केवल निजी जमीन पर बनी कालोनी का मालिकाना हक मिलने से भी उस कालोनी में विधायक फंड से विकास कार्य नहीं हो सकता है। उन्हें बैंक से कर्ज नहीं मिल सकता है और न ही मकान का नक्शा पास हो सकता है। केवल लोगों को भुलावे में रखने के लिए पहले डीडीए ने आउट सोर्सिंग के माध्यम 2019 में फार्म भरवाए। लोगों में भरोसा न होने से अपेक्षित डेढ़ लाख में से चालीस हजार ने भी फार्म नहीं भरे। इस बार दिल्ली नगर निगम के माध्यम से फार्म भरवाए जा रहे हैं।

 

सरकार चाहे जो दावा करे लेकिन सभी अनधिकृत कालोनी को नियमित करना आसान नहीं है। जो कालोनी रेलवे, सेना या जंगल की जमीन पर हैं, उनको नियमित करना ज्यादा कठिन है। सवाल है कि पहले से बसी सभी कालोनी में सीवर कैसे डले। सामुदायिक विकास से जुड़े काम कैसे हों। पानी की लाइन सभी में कैसे डले। कैसे फायर टेंडर कालोनी तक पहुंचे। इन कामों के लिए जिसके भी घर टूटेंगे, वह विरोधी बन जाएगा और अवैध कालोनी को वैध करने वाले दल को उसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। सबसे बड़ी बात है कि इस सिलसिले पर कहीं तो रोक लगानी पड़ेगी। आज 70 फीसदी दिल्ली में अनधिकृत निर्माण है। इसे रोकने के लिए कोई तो ठोस उपाय करना होगा।

 

(लेखक, जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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