वेतन से आगे: विकसित भारत के लिए कुशल कार्यबल की तैयारी
– डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम
कोयंबटूर में काम करने वाले युवा रवि को, जो एक छोटी विनिर्माणइकाई में अपनी पहली औपचारिक नौकरी के छह महीने पूरे कर चुके हैं औरहाल ही में अपनी मासिक तनख्वाह के अलावा उन्हेंबैंक खाते में 7,500 रुपये मिले। लगातार छह महीने की नौकरी पूरी होने के बाद यह रकम अपने आप जारी कर दी गई। इससे पहले उनका परिवार सिर्फ़ अनौपचारिककाम करता था, जिसमें कोई अनुबंध, भविष्य निधि में योगदान या नौकरी का कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं होता था।यह पहला मौका था, जब उनकी नौकरी को आधिकारिक तौर पर दर्ज किया गया और उन्हें इस तरह का लाभ मिला।
रवि को मिली यह धनराशिप्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना (पीएम-वीबीआरवाई) के ‘भाग A’ के तहत मिली पहली किस्त है। इस योजना को केंद्रीय बजट 2024-25 में प्रधानमंत्री के रोज़गार और कौशल पैकेजके हिस्से के तौर पर शुरू किया गया था। इस प्रावधान के तहत, ईपीएफओ में पंजीकृत कंपनियों में पहली बार नौकरी पाने वाले ऐसे कर्मचारी, जिनकी मासिक कमाई 1 लाख रुपये से कम है, उन्हें 15,000 रुपये तक का नकद प्रोत्साहन मिलता है। यह रकम दो किस्तों में दी जाती है: पहली किस्त लगातार छह महीने की नौकरी के बाद और दूसरी किस्त बारह महीने के बाद। इसके लिए शर्त यह है कि कर्मचारी को ईपीएफओ पोर्टल के ज़रिए वित्तीय साक्षरता का कोर्स पूरा करना होगा और यह राशि बचत के एक साधन में जमा की जाएगी, ताकि कर्मचारी को एक आर्थिक सुरक्षा मिल सके। रवि के लिए, ये छह महीने सिर्फ़ योग्यता हासिल करने का समय नहीं थे। ये वो वक्त था, जिसमें उन्होंने अपने काम की जगह को समझा, अपने काम से जुड़ी बुनियादी कौशल और योग्यता सीखी और अपने लिए रोज़गार का एक रिकॉर्ड बनाना शुरू किया, जो पहले कभी नहीं था।
यह समय उनके नियोक्ता के लिए भी अहम था, जो एक छोटी विनिर्माण इकाई थी और उसने अपने विस्तार के तहत रवि को काम पर रखा था। पीएम-वीबीआरवाईके भाग B में प्रावधान है कि जो नियोक्ता अपनी मौजूदा बेसलाइन से ज़्यादा रोज़गार पैदा करते हैं, उन्हें हर अतिरिक्त कर्मचारी के लिए हर महीने 3,000 रुपये तक का सरकारी योगदान मिलता है। यह योगदान अलग-अलग क्षेत्रों में दो साल तक और विनिर्माण क्षेत्र में चार साल तक मिलता है। यह योगदान उस शुरुआती लागत का कुछ हिस्सा कवर करता है, जो किसी कंपनी को नए कर्मचारी को रखने पर उठानी पड़ती है, खासकर तब जब ऑनबोर्डिंग और प्रशिक्षण चल रहा होता है और बिना किसी पिछले औपचारिक अनुभव वाला कर्मचारी, धीरे-धीरे कंपनी के लिए लाभप्रद हो रहा होता है। इस शुरुआती लागत को कम करकेयह प्रावधान, योजना का दायरा रवि जैसे लोगों को काम पर रखने वाले छोटे व्यवसायों तक बढ़ाता है। उसकी जैसी विनिर्माणइकाईयों के लिए, चार साल की अवधि, जो सामान्य अवधि से दोगुनी है, कंपनियों को ऑटोमेशन में निवेश के साथ-साथ अपने कार्यबल का विस्तार करने के लिए भी प्रोत्साहित करती है।
भारत की जनसांख्यिकीय व्यवस्था को देखते हुए, युवा और बढ़ताकार्यबल 2047 तक ‘विकसित भारत’ की ओर बढ़ने के लिए रोज़गार-आधारित विकास के ज़रिए आर्थिक विकास को रफ्तार देने का एक मौका देता है। कार्यबल में शामिल होने वाले नए लोग किस सीमा तक औपचारिक रोज़गार में आते हैं, जहाँ उन्हें सामाजिक सुरक्षा और संस्थागत सुरक्षा मिलती है, यह इस बात पर भी असर डालेगा कि परिवारों और समुदायों में विकास का लाभ कैसे मिलता है। पीएम-वीबीआरवाईका मकसद ‘स्वतंत्र भारत’ से ‘समृद्ध भारत’ तक के सफ़र को मज़बूत करना है और दो साल में 3.5 करोड़ से ज़्यादा औपचारिक नौकरियाँ पैदा करने के लिए प्रोत्साहन देना है।
इस योजना की शुरूआत से, 60 लाख नए कर्मचारी औपचारिक कार्यबल का हिस्सा बन चुके हैं। इनमें से 43.26 लाख (लगभग 71%) 18 से 30 साल की उम्र के हैंऔर 18.04 लाख (लगभग 30%) महिलाएं हैं, जो पहली बार औपचारिक रोज़गार से जुड़ी हैं। ये कर्मचारी विशेषसेवाओं, इंजीनियरिंग, व्यापार, विनिर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य, वस्त्र और आतिथ्य जैसे क्षेत्रों से जुड़े हैं, जो दिखाता है कि कई तरह के औपचारिक संस्थानों में इसे अपनाया गया है।
सिर्फ़ प्रोत्साहन राशि के अलावा, पीएम-वीबीआरवाई से रवि को एक ईपीएफओ खाता और एक यूनिवर्सल अकाउंट नंबर मिला है। इससे वह एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं, जो भविष्य निधि योगदान, बीमा सुरक्षा और कानूनी रोज़गार लाभ भी देता है। उनके जैसे पहली बार औपचारिक रोज़गार पाने वाले कई लोगों के लिए, यह सामाजिक सुरक्षा कवरेज और एक व्यवस्थित रोज़गार से जुड़ने का एक बेहतर मौका है। लगातार छह महीने तक नौकरी करने की शर्त का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि इस योजना के तहत बनी नौकरियां असल करियर की नींव बनें। लंबे समय तक औपचारिक रोज़गार से कई क्षेत्रों में नौकरियों में काम आने वाला कौशल विकसित होता हैं, पेशेवर तौर-तरीके सीखने को मिलते हैं और भविष्य में नौकरी पाने की क्षमता भी मज़बूत होती है। इससे मिलने वाले फ़ायदे योजना के तहत मिलने वाली मदद की अवधि के बाद भी बने रहते हैं।
रोज़गार के मौके पैदा करना एक अहम नीतिगत लक्ष्य है। उतना ही ज़रूरी यह सुनिश्चित करना भी है कि रवि जैसे कर्मचारी औपचारिक अर्थव्यवस्था में अपनी जगह बनाए रख सकें, जहाँ रोज़गार के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा कवरेज और संस्थागत सुरक्षा भी मिलती है। जैसे-जैसे ज़्यादा युवा कर्मचारीऔपचारिक नौकरियों में छह महीने, एक साल और उससे ज़्यादा समय बिताते हैं, कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आता है और छोटे संस्थान भी औपचारिक तरीके से लोगों को काम पर रखने की प्रक्रिया अपनाते हैं। इस योजना के तहत 3.5 करोड़ से ज़्यादा नौकरियां मिलने का अनुमान हैऔर औपचारिक अर्थव्यवस्था का यह धीरे-धीरे बढ़ता दायरा ही वह बदलाव है, जिसे तेज़ी से आगे बढ़ाने के लिए पीएम-वीबीआरवाईको लाया गया है।
(लेखक नीति आयोग के सदस्य हैं)