महंगाई, दोहरी आय और बदलता परिवार

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– डॉ. प्रियंका सौरभ

 

आज के समय में यदि किसी मध्यमवर्गीय परिवार से पूछा जाए कि उसकी सबसे बड़ी चिंता क्या है तो उत्तर लगभग एक जैसा होगा- बच्चों की महंगी शिक्षा, घर का सपना, स्वास्थ्य सेवाओं का बढ़ता खर्च और रोजमर्रा की बढ़ती महंगाई। एक साधारण नौकरीपेशा व्यक्ति वर्षों की बचत के बाद भी अपना घर नहीं खरीद पा रहा। निजी विद्यालयों की फीस इतनी अधिक हो चुकी है कि बच्चों की शिक्षा परिवार के बजट का सबसे बड़ा हिस्सा बन गई है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ?

 

हाल के वर्षों में एक विचार तेजी से चर्चा में आया है कि इन समस्याओं का प्रमुख कारण महिलाओं का बड़ी संख्या में कार्यक्षेत्र में आना है। तर्क दिया जाता है कि जब पति और पत्नी दोनों कमाने लगे तो परिवारों की कुल आय बढ़ गई। बाजार ने इसे अवसर मान लिया और मकानों, स्कूलों तथा अन्य आवश्यक सेवाओं के दाम बढ़ा दिए। इस विचार के समर्थक यह भी कहते हैं कि महिलाओं के घर से बाहर निकलने से परिवार कमजोर हुए, बच्चों का पालन-पोषण प्रभावित हुआ और समाज में अस्थिरता बढ़ी।

 

यह तर्क पहली नजर में कुछ लोगों को आकर्षक लग सकता है क्योंकि वास्तव में आज अधिकांश शहरी परिवारों में एक आय से घर चलाना कठिन होता जा रहा है। किंतु किसी भी सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का विश्लेषण केवल एक कारण के आधार पर नहीं किया जा सकता। समाज, अर्थव्यवस्था और परिवार कई परस्पर जुड़े कारकों से प्रभावित होते हैं। इसलिए आवश्यक है कि इस बहस को भावनाओं से नहीं, तथ्यों और संतुलित दृष्टिकोण से देखा जाए।

 

सबसे पहले यह समझना होगा कि भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों में मकानों की कीमतें केवल परिवारों की आय बढ़ने से नहीं बढ़ीं। शहरीकरण, सीमित भूमि, बढ़ती आबादी, निवेश के रूप में रियल एस्टेट की लोकप्रियता, सरकारी नीतियां, निर्माण लागत, भूमि अधिग्रहण की जटिलताएं और आसान ऋण व्यवस्था जैसे अनेक कारणों ने संपत्ति की कीमतों को प्रभावित किया। यदि केवल महिलाओं के रोजगार से ही मकान महंगे हुए होते तो जिन देशों में महिलाओं की श्रम भागीदारी अधिक है वहां आवास हमेशा सबसे महंगा होना चाहिए था, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।

 

इसी प्रकार शिक्षा की बढ़ती लागत का संबंध भी अनेक कारणों से है। निजी शिक्षा का विस्तार, आधुनिक सुविधाओं की प्रतिस्पर्धा, अंग्रेजी माध्यम का आकर्षण, तकनीकी संसाधनों पर बढ़ता खर्च, शिक्षकों के वेतन, परिवहन, भवन निर्माण और शिक्षा के व्यवसायीकरण ने फीस बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह कहना कि केवल इसलिए स्कूलों की फीस बढ़ी क्योंकि महिलाएं नौकरी करने लगीं, आर्थिक वास्तविकताओं का अत्यधिक सरलीकरण होगा।

 

फिर भी इस विचार के पीछे एक महत्वपूर्ण चिंता अवश्य छिपी हुई है। वह चिंता है परिवार की बदलती संरचना और जीवन की गुणवत्ता। यह सत्य है कि पहले संयुक्त परिवारों में बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा और घरेलू जिम्मेदारियां साझा होती थीं। आज छोटे परिवारों में पति-पत्नी दोनों के कार्यरत होने पर समय का अभाव महसूस होता है। बच्चों के साथ बिताया जाने वाला समय कम हुआ है। तनाव, मानसिक दबाव और कार्य-जीवन संतुलन की समस्याएं बढ़ी हैं। लेकिन इन समस्याओं का समाधान महिलाओं को घर तक सीमित करना नहीं बल्कि ऐसी सामाजिक और आर्थिक नीतियां बनाना है जो परिवार और कार्य के बीच संतुलन स्थापित कर सकें।

 

इतिहास भी इस विषय को उतनी सरलता से नहीं देखता जितना अक्सर सोशल मीडिया पर प्रस्तुत किया जाता है। महिलाओं ने सदियों से खेती, पशुपालन, हस्तशिल्प, व्यापार और पारिवारिक व्यवसायों में योगदान दिया है। औद्योगिक क्रांति के दौरान भी बड़ी संख्या में महिलाएं कारखानों में कार्य करती थीं। इसलिए यह कहना कि इतिहास में महिलाएं हमेशा घर पर ही रहती थीं, वास्तविकता का पूर्ण चित्र प्रस्तुत नहीं करता। अंतर केवल इतना है कि पहले उनके श्रम का बड़ा हिस्सा बिना वेतन के घरेलू कार्यों में दिखाई देता था, जबकि आज वही श्रम वेतनभोगी रोजगार के रूप में अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।

 

यह भी सही है कि घरेलू कार्य का आर्थिक मूल्य अक्सर कम करके आंका गया है। घर संभालना, बच्चों का पालन-पोषण, बुजुर्गों की सेवा और परिवार की व्यवस्था बनाए रखना किसी भी समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य हैं। यदि कोई महिला या पुरुष यह भूमिका निभाता है तो उसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन इसी प्रकार यदि कोई महिला अपनी शिक्षा, योग्यता और इच्छा के अनुसार नौकरी करना चाहती है तो उसके निर्णय का भी समान सम्मान होना चाहिए। वास्तविक सशक्तिकरण का अर्थ विकल्प का अधिकार है, न कि किसी एक जीवनशैली को सभी पर थोप देना।

 

आर्थिक दृष्टि से भी यह विचारणीय है कि यदि लाखों महिलाएं अचानक कार्यबल से बाहर हो जाएं तो देश की उत्पादन क्षमता, कर संग्रह, उपभोग और आर्थिक विकास पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। अनेक क्षेत्रों- शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, सूचना प्रौद्योगिकी, प्रशासन और वैज्ञानिक अनुसंधान में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन क्षेत्रों से महिलाओं की अनुपस्थिति केवल परिवारों को ही नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की प्रगति को प्रभावित करेगी।

 

वास्तविक समस्या शायद कहीं और है। पिछले कुछ दशकों में उत्पादकता जितनी बढ़ी, उतनी गति से आम नागरिक की वास्तविक क्रयशक्ति नहीं बढ़ी। संपत्ति कुछ हाथों में अधिक केंद्रित हुई। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी आवश्यक सेवाओं का तेजी से निजीकरण हुआ। महानगरों में भूमि की उपलब्धता सीमित रही। निवेशकों ने आवास को रहने की आवश्यकता से अधिक निवेश का साधन बना दिया। परिणामस्वरूप मकान आम परिवार की पहुंच से दूर होते गए। इसी प्रकार शिक्षा सेवा न रहकर एक बड़े उद्योग का रूप लेती गई। इन संरचनात्मक कारणों की अनदेखी कर पूरी जिम्मेदारी महिलाओं के रोजगार पर डाल देना समस्या का समाधान नहीं है।

 

निश्चित रूप से आधुनिक जीवनशैली ने परिवारों के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। छोटे बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा, वैवाहिक संबंधों में संवाद की कमी और बढ़ता मानसिक तनाव वास्तविक समस्याएं हैं। इनका समाधान लचीले कार्य घंटे, मातृत्व और पितृत्व अवकाश, गुणवत्तापूर्ण डे-केयर, परिवार समर्थक नीतियों और कार्यस्थलों पर संवेदनशील वातावरण से निकलेगा। केवल महिलाओं को दोषी ठहराने से न तो महंगाई कम होगी और न ही परिवार मजबूत होंगे।

 

यह भी समझना होगा कि अनेक महिलाओं के लिए नौकरी कोई शौक नहीं बल्कि आवश्यकता है। बढ़ती महंगाई, बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा खर्च, आवास ऋण और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा के कारण दोहरी आय कई परिवारों की मजबूरी बन चुकी है। दूसरी ओर लाखों महिलाएं अपनी प्रतिभा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक योगदान के लिए भी कार्य करना चाहती हैं। उनके निर्णय को केवल बाजार की साजिश बताना उनके व्यक्तित्व और अधिकारों दोनों को सीमित करता है।

 

हमें यह स्वीकार करना होगा कि समाज में पुरुष और महिला दोनों की भूमिकाएं बदल रही हैं। यदि दोनों कमाते हैं तो घरेलू जिम्मेदारियां भी दोनों को साझा करनी चाहिए। बच्चों का पालन-पोषण केवल मां का नहीं, पिता का भी समान दायित्व है। इसी प्रकार आर्थिक जिम्मेदारी केवल पुरुष की नहीं बल्कि आवश्यकता और सहमति के अनुसार दोनों की हो सकती है। आधुनिक परिवार की सफलता इसी साझेदारी में निहित है।

 

आज सबसे बड़ी आवश्यकता दोषारोपण की नहीं बल्कि संतुलन की है। हमें ऐसा समाज चाहिए जहां परिवार भी मजबूत हों और महिलाओं की प्रतिभा भी विकसित हो। जहां घरेलू कार्य का सम्मान हो और पेशेवर उपलब्धियों का भी। जहां बच्चों को माता-पिता दोनों का समय मिले और दोनों को अपने सपनों को पूरा करने का अवसर भी। आर्थिक नीतियां ऐसी हों कि शिक्षा और आवास आम नागरिक की पहुंच में रहें। निजी संस्थानों पर प्रभावी नियमन हो, गुणवत्तापूर्ण सरकारी विद्यालय और अस्पताल मजबूत किए जाएं तथा आवास क्षेत्र में पारदर्शिता और किफायत सुनिश्चित की जाए।

 

अंततः यह कहना कि आज की सारी आर्थिक समस्याओं की जड़ महिलाओं का रोजगार है, न तो न्यायसंगत है और न ही तथ्यों पर आधारित। उतना ही गलत यह कहना होगा कि आधुनिक व्यवस्था में कोई समस्या नहीं है। वास्तविकता इन दोनों अतियों के बीच है। परिवारों पर बढ़ता आर्थिक दबाव, बच्चों के लिए समय की कमी और सामाजिक बदलाव गंभीर मुद्दे हैं लेकिन इनके समाधान के लिए हमें व्यापक आर्थिक सुधार, परिवार समर्थक नीतियां और लैंगिक सहयोग की आवश्यकता है, न कि समाज के आधे हिस्से को समस्याओं का कारण घोषित करने की। किसी भी सभ्यता की मजबूती तब बढ़ती है जब वह अधिकार और उत्तरदायित्व, स्वतंत्रता और परिवार, विकास और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित कर सके। यही संतुलन भविष्य के स्वस्थ, समृद्ध और संवेदनशील समाज की आधारशिला बनेगा।

 

(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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