डॉ. फारूक अब्दुल्ला पर कथित हत्या के प्रयास के मामले में आरोपी की जमानत याचिका खारिज**

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**जम्मू, 17 जुलाई:** जम्मू के प्रधान सत्र न्यायालय ने शुक्रवार को पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला पर कथित हत्या के प्रयास के बहुचर्चित मामले में आरोपी कमल सिंह की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि आरोपों की गंभीरता, सार्वजनिक व्यवस्था पर संभावित प्रभाव तथा आरोपी द्वारा अपराध दोहराने की आशंका को देखते हुए उसे जमानत देना उचित नहीं होगा।

 

प्रधान सत्र न्यायाधीश आर. एन. वाटल ने 17 जुलाई 2026 को यह आदेश पारित करते हुए थाना गंग्याल, जम्मू में दर्ज **एफआईआर संख्या 29/2026** से संबंधित जमानत याचिका को खारिज कर दिया। यह मामला **भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 109** तथा **शस्त्र अधिनियम की धारा 3/25** (बाद में धारा 30 का उल्लेख) के तहत दर्ज किया गया है।

 

आरोपी कमल सिंह की ओर से अधिवक्ता प्रिंस खन्ना ने जमानत की मांग करते हुए कहा कि उनका मुवक्किल निर्दोष है, वृद्ध है तथा तंत्रिका और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों से पीड़ित है। बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपी का डॉ. फारूक अब्दुल्ला को नुकसान पहुंचाने का कोई इरादा नहीं था और वह केवल एक विवाह समारोह के दौरान उनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए उनके पास जाने की कोशिश कर रहा था। यह भी कहा गया कि जांच लगभग पूरी हो चुकी है, इसलिए उसकी स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए जमानत दी जानी चाहिए।

 

वहीं लोक अभियोजक हेमांशु प्रकाश ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह एक प्रमुख सार्वजनिक नेता की हत्या के कथित प्रयास का गंभीर और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामला है। उन्होंने दलील दी कि इस स्तर पर जमानत दिए जाने से आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास प्रभावित होगा, गवाहों में भय का माहौल पैदा हो सकता है तथा इस तरह की घटनाओं को बढ़ावा मिल सकता है।

 

अभियोजन पक्ष ने अदालत को यह भी बताया कि पूछताछ के दौरान आरोपी ने कथित रूप से कहा था कि यदि उसे दोबारा मौका मिला तो वह डॉ. फारूक अब्दुल्ला की हत्या करने का प्रयास फिर करेगा और उसे अपने कृत्य पर कोई पछतावा नहीं है।

 

अभियोजन के अनुसार यह घटना **11 मार्च 2026** को जम्मू के ग्रेटर कैलाश स्थित **रॉयल पार्क** में आयोजित एक विवाह समारोह के दौरान हुई थी, जहां डॉ. फारूक अब्दुल्ला और उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी मौजूद थे। जांच एजेंसियों का आरोप है कि कमल सिंह ने डॉ. अब्दुल्ला की हत्या के इरादे से रिवॉल्वर से गोली चलाई, हालांकि गोली अपने लक्ष्य से चूक गई। जांच के दौरान पुलिस ने कथित हथियार, जिंदा कारतूस, इस्तेमाल किया गया खोखा तथा अन्य साक्ष्य बरामद किए। बाद में मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया गया।

 

अभियोजन पक्ष ने अदालत के समक्ष फोरेंसिक और दस्तावेजी साक्ष्य भी प्रस्तुत किए, जिनमें आरोपी द्वारा कथित रूप से लिखे गए हस्तलिखित नोट शामिल थे। जांच एजेंसियों के अनुसार इन नोटों में कश्मीरी हिंदुओं के पलायन और आतंकवाद के दौर में संपत्ति के नुकसान से जुड़े मुद्दों को लेकर डॉ. फारूक अब्दुल्ला के प्रति लंबे समय से चली आ रही नाराजगी और घृणा व्यक्त की गई थी। जांच के अनुसार फोरेंसिक परीक्षण में इन दस्तावेजों की लिखावट आरोपी की ही पाई गई।

 

अपने विस्तृत आदेश में अदालत ने कहा कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तियों पर हमले केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ अपराध नहीं होते, बल्कि इनका व्यापक प्रभाव सार्वजनिक व्यवस्था, लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून के शासन पर पड़ता है। अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समाज के व्यापक हितों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, विशेषकर उन मामलों में जिनके गंभीर सार्वजनिक प्रभाव हो सकते हैं।

 

अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत सामग्री से प्रथम दृष्टया यह संकेत मिलता है कि घटना पूर्व नियोजित थी। हथियार की बरामदगी, कथित उद्देश्य तथा आरोपी के कथित बयानों से यह आशंका भी प्रकट होती है कि रिहा होने पर वह दोबारा ऐसा अपराध कर सकता है। इन परिस्थितियों से सार्वजनिक सुरक्षा और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर गंभीर चिंताएं उत्पन्न होती हैं।

 

बचाव पक्ष द्वारा आरोपी की मानसिक बीमारी और स्वास्थ्य संबंधी दलीलों को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि ऐसा कोई ठोस चिकित्सीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ऐसी मानसिक बीमारी से पीड़ित है, जिसके आधार पर उसे जमानत दी जा सके। अदालत ने कहा कि न्यायिक हिरासत के दौरान भी आरोपी को आवश्यक मानसिक एवं चिकित्सीय उपचार उपलब्ध कराया जा सकता है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि कानूनी दृष्टि से मानसिक अस्वस्थता का प्रश्न मुकदमे के दौरान साक्ष्यों के आधार पर तय किया जाएगा।

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