किसान और गांव को आत्मनिर्भर बनाने की चुनौती
मनोज कुमार मिश्र
अस्सी के दशक के आखिर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों का कम पढ़े-लिखे और खांटी किसान चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत की अगुवाई में भारतीय किसान यूनियन के नाम से अराजनैतिक एक ऐसा आंदोलन खड़ा हुआ जिससे लखनऊ और दिल्ली की सरकारें हिल गई। विभिन्न कारणों से वह आंदोलन कुछ सालों में कमजोर होकर दम तोड़ दिया। जिन सवालों पर वह आंदोलन शुरु हुआ और उसे भारी समर्थन मिला, वे सवाल आज भी वहीं खड़े हैं। केन्द्र की नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने अपने शासन के 12 साल में समाज के हर वर्ग के साथ गांव और किसान को आत्मनिर्भर बनाने के हर प्रयास किए हैं। किसान हित में 2021 में तैयार किए तीन कानून विपक्ष के सुनियोजित विरोध के चलते भारी बहुमत होते हुए किसान हित में वापस लिया। इतना ही नहीं हर साल इसमें नई योजनाओं को शामिल करके और बेहतर काम किए जा रहे हैं। चौधरी टिकैत अपने आंदोलन को अराजनैतिक मानते हुए भी पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को अपना आदर्श मानते थे। आंदोलन के दौरान कुछ बातें दोहराते रहते थे। उसका उल्लेख जरूरी है। वे कहते थे कि किसान अकेली ऐसी कौम है जो ज्यादा उत्पादन करके भी रोती है और कम उत्पादन करके भी। कम उत्पादन में लागत नहीं निकली और ज्यादा उत्पादन में सही दाम नहीं मिलता। उसी तरह हर उत्पादन करने वाला अपने उत्पाद का दाम खुद तय करता है लेकिन किसान के दाम को वे तय करते हैं, जिन्होंने जीवन में कभी खेती की नहीं। वे चौधरी चरण सिंह के मुख्यमंत्री रहते यानी 1967 में जितने गेहूं या गन्ना में जितना सोना मिलता था, उससे थोड़ा कम दाम तय करने की मांग करते रहे।
किसानों की माली हालत सुधारने का यह एक फार्मूला तो यह हो सकता है लेकिन पूरा समाधान इससे भी नहीं हो सकता है। अब हालात बदल गए हैं। सरकार ने गांवों को समृध बनाने के लिए देश के सालाना बजट में भारी बढ़ोतरी की। 2014 में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार केन्द्र में आने से पहले कृषि का बजट 27,663 करोड़ रुपये था, अब वह बढ़कर 1 लाख 40 हजार करोड़ हो चुका है। आज भी देश के 81 करोड़ लोगों को हर महीने फ्री अनाज दिया जा रहा है। सरकार के प्रयास से 58 करोड़ जन-धन खाता खुला है। चार करोड़ पक्के मकान बने। 12 करोड़ शौचालय बने। 16 करोड़ घरों में नल से जल दिया गया। 11 करोड़ लोगों को रसोई गैस कनेक्शन दिए गए। किसान सम्मान निधि के तहत 4.3 लाख करोड़ रुपये दिए गए। 22 फसलों के समर्थन मूल्य में 71 फीसदी की बढ़ोतरी की गई। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार योजना(मनरेगा) अब वीबी जीरामजी योजना बन गई है। उस योजना में 26 करोड़ लोग पंजीकृत हैं, जिन्हें 125 दिन का रोजगार दिया जाता है। हर तरह के उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है। यूरिया पर 90 फीसदी सब्सिडी दी गई है। फसल बीमा योजना लागू की गई है। किसानों को आसानी से कर्ज दिलवाने की व्यवस्था की गई हैं। सिंचाई के साधन बढ़े हैं। किसानों और गांवों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सरकारी योजनाओं की लंबी सूची है।
बावजूद इसके ने तो निचले स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार कम हुआ और न ही गांवों से पलायन रुका। सरकार ने लाभार्थियों का बैंक खाता खुलवाकर सीधे पैसा उसके खाते में भेजने का इंतजाम किया तो भ्रष्टाचार करने वाले बाहर से ही सौदेबाजी करने लगे। एक ही शौचालय के साथ अनेक फोटो खिंचवाकर कमीशन देकर भुगतान पाने लगे। इस भ्रष्टाचार के चलते बिना रिश्वत कम ही आवास बने और दूसरी सुविधाएं लोगों को दी गई। मनरेगा का भ्रष्टाचार तो पहले से ही जग जाहिर है। भाजपा की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(राजग) की सरकार के प्रयास से भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ है, उसमें कमी आई है। इन सभी से बड़ी समस्या बार-बार मानसून का धोखा देना और फसल की सरकार से सही मायने में खरीद की गारंटी न मिलना है। इस बार फिर बरसात दगा दे रही है। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल आदि में कम बरसात होने से धान की रोपाई देरी से हो रही है। इतना ही नहीं वही किसान रोपाई कर पा रहे हैं, जो सक्षम हैं। यानी जिनके परिवार का कोई और व्यवसाय है या परिवार में कोई नौकरी पेशा है। कम बरसात से दलहन और कपास की खेती पर भी असर पड़ा है। यही हाल सब्जियों का है।
सरकार के प्रयास और दावों के बावजूद कब तक देश भर के किसानों को बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी और उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और अपनी फसल का लाभप्रद मूल्य मिलेगा। कब तक किसानी का काम लाभकारी बन जाएगा और बेकारी, भुखमरी और गरीबी के चलते गांवों से होने वाला पलायन कम होगा। मनरेगा के चलते तमाम भ्रष्टाचार होते हुए बड़ी तादाद में लोगों को रोजगार मिले और कोरोना संकट के दौरान बंटे बड़े पैमाने पर चावल-गेहूं से भुखमरी रुकी। सरकार को यह योजना ज्यादा उपयोगी लगी, इसलिए इसे अब तक जारी रखा गया है।
गांव में रहने वाले खेतिहर मजदूरों की समस्या अलग तरह की है। सरकारी योजनाओं का उन्हें भले ही भ्रष्टाचार के चलते पूरा लाभ भले ही नहीं मिलता है लेकिन उससे उनके आर्थिक हालात में कुछ सुधार हुआ है। बड़ी तादाद में खेतिहर मजदूरों ने अपेक्षाकृत संपन्न राज्यों में मजदूरी करके अपनी आर्थिक हालात में सुधार किया। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) अब वीबी जीरामदी के बजट में हर साल बढोतरी हो रही है। इस योजना का इस साल का बजट 1.50 लाख करोड़ सालाना तय किया गया है। बड़ा संकट छोटे किसानों के लिए है, जिनके लिए खेती जानलेवा बनती जा रही है। एक अनुमान के अनुसार देश के 85 फीसद से ज्यादा किसानों के पास ढ़ाई एकड़ से कम जमीन है। इन किसानों पर सरकारी योजनाओं का ज्यादा फोकस होना चाहिए। देश के सात लाख से ज्यादा गांवों को यही किसान आबाद किए हुए हैं। इन्हीं के बूते कोरोना संकट के दौरान भी देश में अन्न की कमी नहीं हो पाई।
विपक्ष के सुनियोजित किसान आंदोलन जिन तीन कृषि कानूनों को खत्म करवाने के लिए शुरू किया गया था उनमें एक कानून मंडियों के बाहर भी उपज बेचने की इजाजत देने से था। दूसरा कानून किसानों को सहकारी खेती की अनुमति देने वाला और तीसरे में अनिवार्य फसलों पर से रोक हटाने का था (1.कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य(संवर्धन व सरलीकरण) कानून-2020,2. कृषक(सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर कानून-2020 और 3. आवश्यक वस्तु(संशोधन) कानून-2020)। सरकार यह समझाती रही कि इन बिलों से किसानों को केवल लाभ ही होगा। उनकी जमीन कोई नहीं ले सकता और मंडियां खत्म नहीं की जाएगी। फसलों को खुले में बेचने की इजाजत दी जाएगी। देश में मंडी और उसमें सक्रिय आढ़तियों की व्यवस्था पंजाब और हरियाणा में ही सबसे मजबूत है। पंजाब से ही कुछ किसानों का जत्था दिल्ली की एक सीमा सिंधु बार्डर पर इन कृषि कानूनों को रद्द करवाने के लिए आंदोलन शुरू किया। उनके साथ हरियाणा के किसान भी जुड़े। फिर टिकरी बार्डर और गाजीपुर बार्डर पर आंदोलन चलने लगा। कुछ ही दिनों में आंदोलन सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों का सुनियोजित षड़यंत्र बन गया।
11 दौर की बातचीत में समाधान नहीं निकला और सरकार को लगा कि उसे सुनियोजित तरीके से किसान विरोधी साबित करने का प्रयास किया जा रहा है। आखिरकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिलों को वापस लेने की घोषणा की और 2012 के संसद के शीतकालीन सत्र में उसे वापस ले लिया गया। एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) किसानों को दिलाने के लिए किसान संगठनों के साथ कमेटी बनाना तय किया गया। आंदोलन में शुरू से ही जमकर राजनीति होने लगी थी। इसलिए यह आंदोलन भी कामयाब न बन पाया। इस आंदोलन के तुरंत बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा लगातार दूसरी बार बहुमत में आ गई। यही हाल चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत की अगुवाई वाली भारतीय किसान यूनियन का हुआ था। वह तभी तक ताकतवर रहा जब तक वह सक्रिय राजनीति से दूर रहा और आंदोलन अहिंसक रहा। वह आंदोलन भी अन्य मुद्दों के अलावा किसानों पर से सीमित इलाके में फसल बेचने पर रोक के विरोध में था। वह आंदोलन तब तक सफल रहा जब तक केवल किसानों का रहा। जैसे ही राजनीतिक दल किसानों का समर्थन पाने के लिए उन्हें अपने पक्ष में करने में लग गए, आंदोलन भटक गया। यहां तक कि चौधरी टिकैत का कैंसर जैसी घातक बीमारी से 2011 में एक तरह से गुमनाम निधन हुआ।
वास्तव में अन्य व्यवसाय करने वालों की तरह किसानों को ऊंची कीमत पर अपनी फसल बेचने की आजादी मिलनी ही चाहिए। यह संभव कब और कैसे होगा, इसका जवाब आसान नहीं है। बड़ी समस्या तो ढाई एकड़ से कम जोत वाले देश के 85 फीसद किसानों की है जिनका हर तरह से शोषण होता आया है। उनके पास अपने फसल को मंडी तक ले जाने के साधन नहीं हैं और न ही फसल को कुछ समय तक सुरक्षित रखने के लिए भंडार। वे तो गांव से लेकर मंडी तक आढ़तियों या बिचौलियों के शोषण झेलने को मजबूर हैं। अगर चार-पांच किसान मिलकर किराए की गाड़ी से अपने उत्पाद मंडी में लेकर पहुंच भी जाएं तो वहां सक्रिय बिचौलियों को पता है कि वे विपन्न हैं उनके पास कुछ दिन इंतजार करने के साधन नहीं हैं, तो वे उन्हें किसी भी दाम पर अपने फसल को बेचने के लिए मजबूर कर देते हैं। इतना ही नहीं उन्हें अगली फसल के लिए पैसों की जरूरत है। उनके घर का हर काम उसी फसल की बिक्री पर निर्भर है। केन्द्र की सरकार इस हालात को बदलने के प्रयास में लगी है। इसीलिए स्वामीनाथन आयोग ने एमएसपी तय करने के लिए समग्र लागत से पचास फीसद जोड़कर दाम तय करने का सुझाव दिया। अभी कुल 23 उत्पादों के लिए ही न्यूनतम समर्थन मूल्य(एमएसपी) तय होता है। जबकि बड़ी तादाद में किसान फल, सब्जी, दूध, अंडा, मछली आदि डेयरी उत्पाद का उत्पादन करते हैं। इसलिए अब सरकार को एमएसपी में शामिल उत्पादों की संख्या बढ़ानी चाहिए। सबसे बड़ी जरूरत यह है कि यह गारंटी मिलनी चाहिए कि एमएसपी से कम दाम पर खरीदने वाले को सजा मिलेगी। केन्द्र सरकार यह दावा करती रही कि मंडी बंद नहीं हो रही होगी। इसके साथ ही सरकार यह भी सुनिश्चित करें कि हर गांव-गांव खरीद केन्द्र काम करेंगे ताकि छोटे किसानों को अपने फसल के वाजिब दाम के लिए दर-दर की ठोकर नहीं खानी पड़े।
सही मायने में सभी किसानों की आर्थिक हालत तभी सुधरेगी जब सरकार चौतरफा प्रयास करेगी। सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने का उपाय कर रही है लेकिन उसका पूरा लाभ किसानों को नहीं मिल रहा है। किसान सम्मान निधि, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, किसान क्रेडिट कार्ड, बैंकों से सस्ते दर पर कर्ज मिलने की व्यवस्था, कृषि उत्पाद को देश के विभिन्न इलाकों में पहुंचाने के लिए विशेष रेलगाड़ी चलाने आदि तमाम ऐसी योजनाएं हैं जिससे छोटे किसानों को काफी मदद मिल रही है। सबसे बड़ी समस्या इन योजनाओं का हर जरूरतमंद तक पहुंचाने और कृषि क्षेत्र में उन प्रयासों को करने से है जिससे किसानों की आमदनी बढ़े। कृषि उत्पाद से जुड़े लाभकारी उद्योगों को गांव-गांव तक पहुंचाने की है। सरकार प्रयास तो कर रही है लेकिन यह काम बड़ा ही चुनौतीपूर्ण है।
(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)