VIP संस्कृति ने जम्मू को बंधक बना लिया
एक बार फिर जम्मू थम गया।
न किसी आपदा के कारण,
न किसी आपात स्थिति में —
बल्कि सिर्फ इसलिए कि कुछ VIP सड़क पर निकल पड़े।
नए साल के दिन बाग़-ए-बाहु रोड पर जो हुआ, वह प्रशासनिक नाकामी का खुला प्रमाण है। सड़कें बंद, लोग परेशान, एंबुलेंस जाम में फंसी और पत्रकारों से कथित बदसलूकी — और यह सब VIP मूवमेंट के नाम पर।
यह शासन नहीं है।
यह सत्ता का घमंड है।
जब एक एंबुलेंस को ट्रैफिक में रोका जाता है और VIP काफ़िला बिना रुके निकल जाता है, तो सिस्टम साफ़ संदेश देता है — यहाँ कुछ ज़िंदगियाँ ज़्यादा अहम हैं।
क्या यही सुशासन है?
माता बावे वाली के दर्शन के नाम पर पूरे इलाके को ठप कर देना, लोगों को उनके ही घरों तक न जाने देना — क्या आस्था के नाम पर जनता को सज़ा देना जायज़ है?
सबसे चिंताजनक घटना एक स्थानीय पत्रकार के साथ हुई कथित बदसलूकी है, जिसे करीब 15 मिनट तक रोका गया और घर तक जाने नहीं दिया गया।
अगर सवाल पूछने वाले पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं, तो आम नागरिकों की हालत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
बाग़-ए-बाहु, गोरखा नगर और आसपास के इलाकों के लोग मानो अघोषित कर्फ्यू में डाल दिए गए।
न कोई सूचना,
न कोई जवाब,
न कोई माफ़ी —
सिर्फ़ बैरिकेड, डांट-फटकार और सत्ता का प्रदर्शन।
आज जम्मू एक ऐसे शहर में बदलता जा रहा है जहाँ
सड़कें जनता की नहीं,
VIP काफ़िलों की जागीर बन चुकी हैं।
ऑफिस जाने वाले कर्मचारी, छात्र, बुज़ुर्ग, मरीज़ —
सबको रुकना होगा,
क्योंकि “VIP निकल रहे हैं”।
कई लोग आज खुले तौर पर कह रहे हैं कि LG शासन के दौरान VIP मूवमेंट सीमित था और ऐसे हालात कम देखने को मिलते थे। आज जब चुनी हुई सरकार है, तो VIP संस्कृति पहले से ज़्यादा हावी क्यों हो गई?
और सबसे दुखद बात —
यह धारणा मज़बूत होती जा रही है कि J&K पुलिस ऊपर वालों की सुनती है, जनता की नहीं।
जहाँ अफ़सर का आदेश ज़रूरी है,
वहाँ आम आदमी की मजबूरी बेकार है।
जम्मू के लोग अब थक चुके हैं —
रुक-रुक कर,
डांट खाकर,
अपमान सहकर।
यह सिर्फ़ एक VIP मूवमेंट का मामला नहीं है।
यह उस सोच का मामला है,
जो मानती है कि सत्ता आए तो जनता रुक जाए।
जम्मू इससे बेहतर का हक़दार है।
ऐसे शासन का,
जो जनता के साथ चले —
उनके ऊपर से नहीं।