पूँछी मोहल्ला अब भी डूबा दर्द में ; आज भी पानी और मलबे के साए में
Northlines की टीम पहुँची वहाँ, जहाँ अब तक कोई नहीं गया
By आशु कुमार
तवी नदी की तबाही ने जहाँ अख़बारों और टीवी चैनलों की सुर्ख़ियों में जगह बनाई, वहीं कई ऐसे कोने भी हैं जिन्हें अब तक न तो किसी राहत दल ने छुआ और न ही किसी नेता ने देखा। ऐसा ही एक इलाका है पूँछी मोहल्ला, गोरखा नगर, बहु किला क्षेत्र का वार्ड नंबर 48। यहाँ बाढ़ ने कई परिवारों की दुनिया उजाड़ दी और आज भी लोग बेसब्री से मदद का इंतज़ार कर रहे हैं।
इस इलाके तक पहुँचना किसी कठिन सफ़र से कम नहीं था। नॉर्थलाइंस टीम को टूटी-फूटी सड़कों, बह चुके रास्तों और कीचड़-मलबे से होकर गुज़रना पड़ा। कभी चहल-पहल वाला यह मोहल्ला अब खंडहर में तब्दील हो चुका है।
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स्थानीय लोगों ने उस भयावह रात को याद करते हुए कहा –
“वो एक ऐसी रात थी जब नदी ने सब कुछ निगल लिया।”
“क्या हम इस मिट्टी के नागरिक नहीं?”
जैसे ही नॉर्थलाइंस टीम वहाँ पहुँची, लोगों की आँखों में उम्मीद की चमक दिखाई दी। उनकी बातों में दर्द साफ झलक रहा था।
“पाँच दिन हो गए हैं,” एक बुजुर्ग ने कहा, “अब तक कोई नेता, कोई राहत कर्मी, कोई मीडिया वाला यहाँ नहीं आया। क्या हम इस मिट्टी के नागरिक नहीं हैं?”

लकवाग्रस्त पति और टूटे सपनों का बोझ
इन कहानियों के बीच एक महिला का दर्द सबसे गहरा था। आँसुओं को रोकते हुए उसने बताया कि उसका पति पिछले दस साल से लकवाग्रस्त है और बेटा ही घर का एकमात्र कमाने वाला है।
उसने कहा –
“बाढ़ में सब कुछ बह गया – फर्नीचर, कपड़े, बर्तन। पड़ोसियों ने मिलकर मेरे पति को बचाया, वरना वो शायद ज़िंदा नहीं रहते। अब हम आगे कैसे जीएँ? खाली हाथ कहाँ जाएँ?”
उसने कैमरे के सामने हाथ जोड़कर अपील की –
“हम भी इंसान हैं। सरकार और नेता अगर सुन रहे हैं तो हमें मत भूलिए। हमारे हालात देखिए और हमें फिर से खड़े होने में मदद कीजिए।”
उपेक्षा का दर्द सबसे बड़ा
गोरखा नगर के लोगों का दर्द सिर्फ़ सामान गंवाने का नहीं, बल्कि उपेक्षा का भी है।
एक युवक आनंद ने कहा –
“शहर में बाढ़ आते ही नेता कैमरे लेकर दौड़े चले आए। लेकिन हमारी गलियों में सन्नाटा है। शायद रास्ते टूटे होने की वजह से, या शायद इसलिए कि किसी को परवाह ही नहीं। लेकिन हम भी हैं, हमारे बच्चे भी भूखे हैं।”
मानवीय संवेदना की सबसे ज़्यादा ज़रूरत
नॉर्थलाइंस टीम ने मौके पर ज़रूरतमंद परिवारों को राहत सामग्री दी। लेकिन हक़ीक़त यह है कि असली कमी सिर्फ़ राशन या कपड़ों की नहीं है – कमी है मानवीय संवेदना और सरकारी ध्यान की।
यह भूला हुआ वार्ड-48 हमें याद दिलाता है कि आपदा का जवाब तब तक अधूरा है, जब तक हर पीड़ित तक राहत न पहुँचे।
अंत में, एक निवासी की भारी आवाज़ में कही गई पंक्तियाँ इस सच्चाई को समेट लेती हैं –
“पानी ने हमारे घर छीने, लेकिन उपेक्षा हमारी उम्मीद छीन रही है।”