जाट योद्धा माता भाग कौर

जाट योद्धा माता भाग कौर – शक्ति और साहस की प्रतीक

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Photo credit – www.sikhiwiki.org

भारत की पवित्र भूमि पर अनेक वीर और वीरांगनाए अवतरित हुए  है जिन्होंने अपना नाम अपनी बहादुरी से अमर कर दिया, लेकिन चाटुकार इतिहासकारो ने वीरो और वीरांगनाओं का नाम इतिहास से मिटाने की भरपूर कोशिश की और कुछ कायर लोगो को वीर का दर्जा इतिहास में दे दिया।

आज हम ऐसी ही एक वीरांगना के बारे में आपको बताने जा रहे है जिनका नाम माता भाग कौर था जो माई भागो के नाम से भी प्रसिद्ध थी.

माता भाग कौर (माई भागो) एक महान योद्धा औरत जिन्हे भारत  की धरती पर सबसे बहादुर और साहसी औरत कहा गया है जिन्होंने मुठ्ठी भर जाट योद्धाओ का नेतृत्व करके कई बार मुग़लो की बड़ी बड़ी सेनाओ को हराया।

माता भाग कौर  का जन्म सन 1671 मे गाँव झबल कलां अमृतसर पंजाब [ मझ (सेंट्रल पंजाब)] में  जाट चौधरी लंगाह सिंह ढिल्लों (ढिल्लों 84 खाप के प्रधान) के छोटे भाई चौधरी पिरो सिंह की पौत्री और भाई मल्लो शाह की पुत्री के रूप में हुआ था. यह क्षेत्र जाटो की बहादुरी के लिए विख्यात है. उनका परिवार गुरु अर्जन देव के समय ही सिख धर्म अपना चुका  था।  माई भागो 4 भाइयो की इकलौती बहन थी.

माता भाग कौर  का विवाह पट्टी के जागीरदार चौधरी निधान सिंह वररैछ (warriach) के साथ शाही अंदाज़ मे हुआ पर आप शाही ठाठ बाठ छोड़कर देश को मुगलो से आज़ाद कराने में लग गयी. यह वह दौर था जब पंजाब के जाट सिख धर्म अपना रहे थे। सन 1705 में मुगलो और राजपूतो की सयुंक्त शाही सेना को सिर्फ 40 सिख जाट योद्धाओं की मदद से हराकर माता भाग कौर  को प्रसिद्धि मिली। 

सन 1705 मे कई लाख राजपूत और मुस्लिम सैनिको  को साथ लेकर मुगलों  ने श्री आनंद पुर साहिब के पवित्र शहर को घेर लिया, मुग़ल सेना की संख्याबल  का अंदाजा इस से लगाया जा सकता है कि हिंदुस्तान की लगभग सभी राजपूत रियासतें (सिर्फ 3 को छोड़कर) मुग़लो के साथ थी.

दशम सिख गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह की सेवा मे 10,000 जाट लगे हुए थे जिनमे ज्यादातर मझ (सेंट्रल पंजाब) के थे, कई लाख की मुग़ल सेना को देखकर गुरु जी ने कहा की जो लड़ाई छोड़कर जाना चाहता हो चला जाए, पर वो मेरा सिख नहीं होगा। 10 हज़ार में से 40 जाटो ने अपने अपने नाम लिखकर मैदान छोड़ दिया, बाकी बारूद की तरह दुश्मन को जलाने के लिए तैयार थे.

जब वो 40 जाट सिख धर्म त्याग कर जा रहे थे तो उनका सामना माता भाग कौर से हो गया, माता भाग कौर ने उन 40 जाट सैनिको को चूड़ियाँ देकर कहा की ये पहन लो, ना तुम जाट हो ना सिख और ना ही मर्द, याद रखना की असली जाट मैदान नहीं छोड़ता और आखिरी साँस तक दुश्मन से लड़ता है. खरी खोटी सुनने के बाद उन 40  जाट सैनिको की आँखों में खून उतार आया और वो बोले माँ हमे माफ़ कर दो हम लड़ेंगे और आखिरी साँस तक लड़ेंगे पर अब हम में गुरु जी से आँखें मिलाने की हिम्मत नहीं है, हम मरकर ही मैदान छोड़ेंगे।

ऐसा सुनकर माता भाग कौर ने तलवार निकाल ली, माई ने पहले भी कई मुग़ल जत्थो को हराया था, अब माँ आगे थी और 40 जाट योद्धा पीछे थे, माता जी ने मुग़लो की  फ़ौज़ पर धावा बोल दिया, जाट आग बन कर दुश्मनो  पर बरसे। मुगलो की बन्दूके, तोपें, तलवारें किसी काम ना आई और कुछ ही समय में माता भाग कौर और 40 जाटो की फ़ौज़ ने कई हज़ार मुग़ल सेना को काट दिया।

जाट आखिरी सांस तक गंडासों  (gandassa) से लड़े, इस लड़ाई में सभी सिख जाट योद्धा वीर गति को प्राप्त हुए, सिर्फ एक बच पाया और माता जी भी सकुशल रही. फिर माता जी ने इस जाट को साथ लेकर दूसरा मोर्चा संभाला, आनंद पुर साहिब की लड़ाई को गुरु जी और माई भागो की छोटी सी जाट फ़ौज़ ने बडे अंतर से जीता, इस लड़ाई में लाखो मुग़ल सैनिक मारे गए.

फिर माता जी ने गुरु जी से निवेदन किया की जिन 40 सिखों ने मैदान छोड़ा था वो सबसे ज्यादा बहादुरी से लडे, आप उन्हें माफ़ करदें, गुरु जी उन्हें माफ़ कर दिया और ये 40 जाट सिख चाली मुक्ति के नाम से मशहूर  हुए.

इस लड़ाई में गुरु जी अपने बच्चों और पंज प्यारो को भी खो दिया। इस लड़ाई के बाद माई भागो निहंग वेश में गुरु गोबिंद सिंह की अंगरक्षक बन गईं और उनके साथ ही रहीं. सन 1708  में गुरु गोविन्द सिंह के निधन के बाद माता भाग कौर ने जिनवारा (Bidar से 11  किलोमीटर, वर्तमान कर्नाटक राज्य ) जाकर अपनी बाकि जिंदगी गुजारी. उनकी झोपडी जिसमे वो ध्यान लगाया करती थी वह आज गुरुद्वारा तप स्थान माई भागो के रूप में विद्यमान है. जहां लोग आते है और माई भागो के बलिदान को याद करते हैं.

इसके बाद पंजाब के 12 के 12 चौधरी (जाट मिसल्स) इकट्ठे हो गए और अपना राज्य ईरान बॉर्डर तक फैलाया।

हमे गर्व हैं की ऐसी बहादुर औरतें हमारे देश  में पैदा हुई.


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